
श्री बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (बीकेटीसी) के अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी ने कहा है कि बदरीनाथ और केदारनाथ धाम पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि सर्वोच्च आध्यात्मिक केंद्र हैं। उन्होंने गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर प्रतिबंध को शास्त्र सम्मत और संविधान के अनुच्छेद 25 व 26 के अनुरूप बताया।
द्विवेदी ने कहा कि यह निर्णय सदियों पुरानी आस्था, अनुशासन और शुद्धता के संरक्षण के लिए है, किसी धर्म के खिलाफ नहीं। गंगोत्री व यमुनोत्री मंदिर समिति भी ऐसे प्रस्ताव पारित कर चुकी है।
देहरादून। श्री बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (बीकेटीसी) अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी ने कहा है कि केदारनाथ और बदरीनाथ धाम पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि सनातन परंपरा के सर्वोच्च आध्यात्मिक केंद्र हैं।
धर्मशास्त्रों के अनुसार तीर्थ का उद्देश्य आत्मिक साधना मानी गई है। यहां प्रवेश का प्रश्न नागरिक अधिकार का नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था और परंपरा का है। ऐसे में इन धामों में गैर-हिंदुओं का प्रवेश वर्जित करना शास्त्र सम्मत और संविधान के प्रविधानों के अनुच्छेद 25 और 26 के अनुरूप है।
बीकेटीसी अध्यक्ष ने कहा कि उत्तराखंड में पर्यटन के लिए हजारों स्थल खुले हैं। ऐसे में धामों की पहचान बदलना आस्था के साथ अन्याय होगा, जो व्यक्ति सनातन परंपरा में आस्था रखता है, वह आस्था के अनुसार आगे बढ़ सकता है। लेकिन, धाम की मूल धार्मिक पहचान से समझौता नहीं किया जा सकता।
कहा कि संविधान के अनुच्छेद 25 में स्पष्ट है कि सिख, जैन, बौद्ध सनातन परंपरा के अंग है। अनुच्छेद 26 हमें यह अधिकार देता है कि हम अपनी धार्मिक परंपराओं और पूजा-पद्धति की रक्षा करें। यह निर्णय किसी के खिलाफ नहीं, बल्कि सदियों पुरानी आस्था, अनुशासन और शुद्धता के संरक्षण के लिए है।
कहा कि श्री केदार सभा सहित श्री डिमरी धार्मिक केंद्रीय पंचायत व धर्मावलंबियों की मांग पर आगामी बोर्ड बैठक में बदरीनाथ व केदारनाथ धाम में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर प्रतिबंध संबंधित प्रस्ताव लाने की घोषणा की है।
श्री गंगोत्री व श्री यमुनोत्री मंदिर समिति ने मंदिर में गैर हिंदुओं के प्रवेश पर प्रतिबंध संबंधित प्रस्ताव पारित किया है।
बदरी-केदार में गैर-आस्थावान प्रवेश का कभी नहीं रहा प्रचलन
बीकेटीसी अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी ने कहा कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 26 हर धार्मिक संप्रदाय को अपने धार्मिक मामलों का प्रबंधन करने का अधिकार देता है।
यह ऐतिहासिक तर्क है केदारनाथ और बदरीनाथ आदि शंकराचार्य की ओर से स्थापित वैदिक परंपरा के केंद्र हैं। यहां की पूजा-पद्धति शुद्ध वैदिक दीक्षा और संन्यास पर आधारित है।
ये धाम मोक्ष परंपरा से जुड़े हैं। यहां विदेशी अथवा गैर-आस्थावान प्रवेश का कभी प्रचलन नहीं रहा। गैर हिंदुओं का मंदिरों में प्रवेश पहले से प्रतिबंधित रहा है, यह कोई नया नियम नहीं, बल्कि सदियों पुरानी परंपरा का औपचारिक पालन है।
हर धर्म को अपनी पवित्रता और अनुशासन तय करने का अधिकार
बीकेटीसी अध्यक्ष ने कहा कि यह किसी धर्म के विरोध का विषय नहीं है। यह प्रश्न केवल यह है कि क्या व्यक्ति इस परंपरा में आस्था रखता है अथवा नहीं। कहा कि मस्जिद में नमाज की शर्तें है।
चर्च में संस्कार की सीमाएं निर्धारित हैं। हर धर्म को अपनी पवित्रता और अनुशासन तय करने का अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट ने बार-बार कहा है कि मंदिर में प्रवेश कोई सामान्य नागरिक अधिकार नहीं, बल्कि धार्मिक आचरण का विषय है।









