
आज से मां दुर्गा की आराधना होगी। पहले दिन कलश स्थापना होगी। साथ ही मां शैलपुत्री की पूजा की जाएगी। लेकिन अब लिंगानुपात साध देवियों की साधना करनी होगी। सरकारी आंकड़ों में घटी बेटियों की संख्या ने चिंता बढ़ाई है। इसी महीने उत्तराखंड के सभी जिलों के लिंगानुपात का आंकड़ा सार्वजनिक किया गया।
सरकारी आंकड़ों में घटी बेटियों की संख्या ने चिंता बढ़ा दी है। बृहस्पतिवार से शुरू हो रहे देवी के पर्व नवरात्र पर पहाड़ से लेकर मैदान तक लोगों को साधना से पहले लिंगानुपात को भी साधने का संकल्प लेना होगा। ताकि समाज में बेटियों और बेटों के बीच के संख्यात्मक अंतर को कम से कम किया जा सका।
हॉस्पिटल इंफॉर्मेशन मैनेजमेंट सिस्टम (एचआईएमएस) की ओर से इसी महीने उत्तराखंड के सभी जिलों के लिंगानुपात का आंकड़ा सार्वजनिक किया गया। आंकड़ों ने पहाड़ी जिलों में घटती बेटियों की संख्या की बात को पूरी तरह पुष्ट कर दिया है।
प्रदेश के कुल 13 में से 11 जिले ऐसे हैं जिनका लिंगानुपात 950 से कम दर्ज किया गया है। यानी प्रति एक हजार लड़कों में 950 से कम लड़कियां रिकॉर्ड हुई हैं।
इतना ही नहीं तीन जिले ऐसे भी प्रकाश में आए जिनका लिंगानुपात 900 से भी कम दर्ज किया गया। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (एनएफएचएस) के तहत उत्तराखंड में लिंगानुपात पर किए गए सबसे नवीतन सर्वे वर्ष 2020-21 की तुलना जब एचआईएमएस के हालिया आंकड़ों से करते हैं तो व्यग्रता की एक बड़ी लकीर खिंच जाती है।
पलायन भी कम होते लिंगानुपात का प्रमुख कारण
एनएफएचएस के सर्वे में जिन चार जिलों का लिंगानुपात एक हजार से अधिक दर्ज किया गया था उनकी स्थिति आज एचआईएमएस के आंकड़ों में बेहद खराब दिख रही है। अधिकारियों से जब इसका कारण जानने का प्रयास किया तो हैरान कर देने वाली बातें सामने आईं।
उन्होंने कहा कि लिंगानुपात बढ़ाने के लिए पहाड़ के कुछ जिलों में जागरूकता अभियान चलाया जा रहा था। इस दौरान लोगों की मंशा जानी तो उन्होंने बताया कि लड़के सेना में चले जाते हैं लिहाजा लड़कियों के लिए यह काफी मुश्किल है। इसके अलावा पलायन भी कम होते लिंगानुपात का प्रमुख कारण है।









