
देहरादून, कालसी और मसूरी वन प्रभागों में साल के पेड़ों पर होपलो कीटों का गंभीर हमला हुआ है। ये कीट पेड़ों को भीतर से खोखला कर रहे हैं, जिससे लगभग 20,000 पेड़ खतरे में हैं। वन विभाग ने एफआरआई से मदद मांगी है,
जिसने देहरादून का निरीक्षण किया है। कीटों का कोई ठोस इलाज नहीं है; गंभीर रूप से प्रभावित पेड़ों को काटना पड़ता है, जबकि अन्य के लिए ट्रैप और कीटनाशक का उपयोग किया जा रहा है।
देहरादून। जिले के साल के वनों पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है। साल के पेड़ों पर होपलो कीटों ने बड़ा हमला बोला है। होपलो (साल बोरर कीट या साल को भीतर से खाने वाला कीड़ा) साल के पेड़ों को भीतर से खोखला करता जा रहा। जिससे पेड़ों का जीवन गंभीर खतरे में पड़ गया है। कीट का सर्वाधिक प्रकोप देहरादून वन प्रभाग में नजर आ रहा है।
इसके अलावा कालसी और मसूरी वन प्रभाग में भी होपलो के हमले ने वन विभाग के अधिकारियों की नींद उड़ा रखी है। बड़े स्तर पर साल के वनों पर मंडरा रहे खतरे को देखते हुए वन विभाग ने वन अनुसंधान संस्थान (एफआरआइ) से मदद मांगी है। एफआरआइ की टीम ने देहरादून वन प्रभाग का निरीक्षण कर लिया है, जबकि कालसी और मसूरी में निरीक्षण किया जाना बाकी है।
होपलो से प्रभावित देहरादून जिले के तीन प्रभागों में साल वनों की हिस्सेदारी 70 प्रतिशत तक है। ऐसे में साल के पेड़ों पर बढ़ते कीटों के प्रकोप ने अधिकारियों को चिंता में डाल दिया है।
वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार देहरादून वन प्रभाग में 12 हजार के करीब साल के पेड़ होपलो से प्रभावित हैं। इसी तरह कालसी में 5000 के करीब और मसूरी में प्रभावित पेड़ों की संख्या 3000 से अधिक होने का अनुमान है।
एफआरआइ कर रहा पेड़ों को चिह्नित
वन विभाग के आग्रह पर एफआरआइ की कीट विज्ञान प्रभाग की टीम होपलो प्रभावित वनों का निरीक्षण कर रही है। ताकि रोग के के प्रभाव के हिसाब से पेड़ों का आकलन किया जा सके। देहरादून में यह कार्य किया जा चुका है। कालसी में टीम का दौरा प्रस्तावित है, जबकि मसूरी वन प्रभाग में कार्ययोजना स्वीकृति के बाद विज्ञानी दौरा करेंगे।
होपलो का नहीं कोई ठोस इलाज, गंभीर रोग पर काटने पड़ते हैं पेड़
एफआरआइ के वरिष्ठ विज्ञानी डा अरुण प्रताप के अनुसार होपलो से रोग का ठोस निदान नहीं है। गंभीर रूप से ग्रसित पेड़ों को काटना पड़ता है। वहीं, अल्प रूप से बीमार पेड़ों से होपलो कीटों को ट्रैप किया जाता है। सभी वन प्रभागों के निरीक्षण के बाद पेड़ों की स्थिति के मुताबिक चिह्निकरण किया जाएगा।
इस तरह साल को तिल-तिल मारता है होपलो
होपलो कीट साल के पेड़ों को भीतर से खाकर बेहद गंभीर नुकसान पहुंचाता है। यह कीट सबसे पहले पेड़ की छाल में छोटे-छोटे छेद बनाकर अंडे देता है। अंडों से निकली सुंडी (लार्वा) तने के अंदर गहराई तक सुरंग बनाते हुए हृदयकाष्ठ (हार्टवुड) को कुतरना शुरू कर देती है, जिससे पेड़ का सबसे मजबूत हिस्सा खोखला हो जाता है।
अंदर की लकड़ी पाउडर जैसी बुरादे में बदल जाती है और पेड़ में ऊपर तक पानी व पोषक तत्व पहुंचने का प्रवाह रुक जाता है। कुछ समय बाद तने से काला/सफेद चूर्ण गिरना शुरू होता है, जो संक्रमण का प्रमुख संकेत है। लगातार बढ़ते नुकसान के कारण पेड़ ऊपर से सूखना शुरू करता है और अंत में खड़े-खड़े कमजोर होकर गिर सकता है। इस तरह होपलो कीट साल के पेड़ों को धीमे-धीमे भीतर से खत्म कर देता है।
कीट के निदान के यही तरीके कारगर
संक्रमित पेड़ों की तत्काल पहचान और मार्किंग
पेड़ों के तने से बुरादा गिरना, छेद और रस का रिसाव दिखने पर उन्हें चिन्हित किया जाता है। ताकि संक्रमण फैलने से पहले कार्रवाई हो सके। अत्यधिक संक्रमित पेड़ों को काटकर नष्ट (कंटेनमेंट फेलिंग) किया जाता है। ऐसे पेड़ों को जंगल से बाहर ले जाकर नष्ट किया जाता है। यह सबसे प्रभावी तरीका है, क्योंकि कीट पेड़ के भीतर रहता है और कटान से उसका फैलाव रुक जाता है।
फेरोमोन ट्रैप और ट्रैप-ट्री तकनीक का प्रयोग
इन खास ट्रैपों में कीट आकर्षित होकर फंसते हैं। इसके लिए साल के कुछ पेड़ों को काटकर कीटों के लिए चारा तैयार किया जाता है। कई जगह इससे 50 से 70 प्रतिशत तक कीट पकड़ने में सफलता मिलती है। यह कम प्रभावित पेड़ों के मामले में किया जाता है।
इसके अलावा तने पर कीटनाशक का छिड़काव/पेस्टिंग (वैज्ञानिक निर्देश अनुसार) किया जाता है। इसमें लार्वा और वयस्क कीट मर जाते हैं। इसके अलावा जंगल की सफाई और सूखी लकड़ी हटाने की कार्रवाई भी की जाती है। क्योंकि सूखे पत्ते, टूटे तने, मरी लकड़ी आदि कीट के प्रजनन स्थान बनते हैं। इनकी सफाई संक्रमण को रोकने में बहुत मदद करती है।
हर साल 2000 पेड़ों को पड़ता है काटना
वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार इस वर्ष होपलो कीटों का प्रकोप कुछ अधिक है। क्योंकि, सामान्य रूप में साल के पेड़ों में यह कीट पाए ही जाते हैं। जिस कारण एक वन प्रभाग में औसतन दो हजार के करीब पेड़ों को इस कीट रोग के कारण काटना पड़ जाता है। इस वर्ष कुछ अधिक पेड़ इस कीट की भेंट चढ़ सकते हैं।
प्रभाग में रोग ग्रस्त पेड़ों पर एफआरआइ की रिपोर्ट मिलने के बाद उनके पातन और कीटों को ट्रैप करने की कार्रवाई की जाएगी। – नीरज शर्मा, प्रभागीय वनाधिकारी (देहरादून वन प्रभाग)
एफआरआइ को रोगग्रस्त करीब 5000 पेड़ों का ब्यौरा भेजा गया था। विज्ञानियों का दौरा प्रस्तावित है। आकलन के बाद आगे के कदम उठाए जाएंगे। – मयंक गर्ग, प्रभागीय वनाधिकारी (कालसी वन प्रभाग)
होपलो कीटों को लेकर कार्ययोजना को स्वीकृति मिलने का इंतजार है। इसके बाद एफआरआइ के विशेषज्ञों से दौरा करवाकर आवश्यक कदम उठाए जाएंगे। – अमित कंवर, प्रभागीय वनाधिकारी (मसूरी वन प्रभाग)








