
देहरादून की कविता खान अपनी जीवनशैली और समाजसेवा से सांप्रदायिक सद्भाव का संदेश दे रही हैं। मुस्लिम परिवार में विवाह के बावजूद वे ईद और दीपावली जैसे सभी त्योहार मनाती हैं।
देहरादून। ऐसे समय में, जब समाज में वैमनस्य की दीवारें ऊंची होती जा रही हैं, देहरादून की कविता खान अपनी जीवनशैली और समाजसेवा के जरिये एक अलग संदेश दे रही हैं।

मुस्लिम परिवार में विवाह के बाद भी उन्होंने अपनी सांस्कृतिक जड़ों को कमजोर नहीं होने दिया। उनके जीवन में ईद की खुशियां भी हैं और दीपावली के दीप भी। उनके घर में लोहड़ी भी जलती है, होली भी खेली जाती है।
सहस्रधारा रोड निवासी कविता ने स्नातकोत्तर शिक्षा के बाद वर्ष 2005 में समाजसेवी आरिफ खान से विवाह किया। वह बताती हैं कि विवाह के बाद कभी यह महसूस नहीं हुआ कि जीवन किसी धार्मिक सीमा रेखा में बंध गया है।
परिवार ने हमेशा हर परंपरा को सम्मान दिया और यही सोच आगे चलकर समाजसेवा की ताकत बनी। कविता का मानना है कि धर्म का वास्तविक अर्थ लोगों को जोड़ना और जरूरतमंदों के जीवन में उम्मीद के दीप जलाना है।
इसी सोच के साथ उन्होंने वर्ष 2013 में बस्ती के बच्चों के लिए ‘अपनी पाठशाला’ शुरू की। शुरुआत घर से दो-तीन बच्चों के साथ हुई, लेकिन आज रायपुर रोड क्षेत्र में 15 से 20 बच्चों को नियमित रूप से पढ़ाया जा रहा है।
यहां सामान्य ज्ञान, गणित, विज्ञान और हिंदी की शिक्षा के साथ किताबें और स्टेशनरी भी निश्शुल्क दी जाती हैं।
महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए उन्होंने अक्टूबर 2025 में एनएपीएसआर चैरिटेबल ट्रस्ट के तहत प्रशिक्षण शुरू किया। महिलाएं यहां बेकार कपड़ों से बैग, स्क्रंची, ब्रेसलेट और अन्य उपयोगी वस्तुएं बनाना सीख रही हैं। हाल ही में लोक भवन में आयोजित राज्य पुष्प प्रदर्शनी में लगाए गए स्टाल से 15 हजार रुपये की बिक्री हुई।
‘प्रोजेक्ट मुस्कान’ से 500 घरों तक पहुंचीं खुशियां
वर्ष 2016 में शुरू किए गए ‘प्रोजेक्ट मुस्कान’ के तहत कविता त्योहारों पर बस्तियों में जाकर बच्चों के साथ खुशियां साझा करती हैं। दीपावली पर दीये, होली पर रंग और ईद पर मिठास के जरिये अब यह अभियान 500 परिवारों तक पहुंच चुका है।
दो बच्चों से शुरू हुई ‘अपनी पाठशाला’
शुरुआत में अभिभावकों को पढ़ाई के लिए तैयार करना कठिन था, लेकिन आज कई बच्चे नियमित पढ़ाई से जुड़े हैं और उनके परिवार भी इसमें सहयोग कर रहे हैं।









