
मसूरी स्थित एलबीएसएनएए में 2015 का रूबी चौधरी फर्जीवाड़ा एक नए मामले के बाद फिर चर्चा में है। रूबी चौधरी ने फर्जी दस्तावेजों से प्रवेश पाया था, जिससे सत्यापन व्यवस्था पर सवाल उठे थे।
एक पूर्व डिप्टी डायरेक्टर भी इसमें संदिग्ध पाए गए थे। हालिया घटना, जिसमें एक युवक फर्जी यूपीएससी परिणाम के साथ पहुंचा, ने प्रशासनिक प्रशिक्षण की सत्यापन प्रणाली की प्रभावशीलता पर फिर से प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
देहरादून। लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासनिक अकादमी (एलबीएसएनएए) मसूरी में वर्ष-2015 में सामने आया रूबी चौधरी फर्जीवाड़ा एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है।
शनिवार को अकादमी में फर्जी यूपीएससी रिजल्ट के आधार पर एक युवक के प्रशिक्षण के लिए पहुंचने का मामला सामने आने के बाद उस पुराने प्रकरण की याद ताजा हो गई है, जिसने उस समय पूरे प्रशासनिक तंत्र को सवालों में खड़ा कर दिया था।
वर्ष -2015 में रूबी चौधरी नामक महिला ने फर्जी दस्तावेजों के सहारे खुद को यूपीएससी चयनित अभ्यर्थी बताते हुए एलबीएसएनएए में प्रवेश प्राप्त कर लिया था। शुरुआती दौर में वह नियमित रूप से प्रशिक्षण में भी शामिल होती रही। बाद में जब दस्तावेजों की गहन जांच की गई तो फर्जीवाड़े का खुलासा हुआ।
जांच में सनसनीखेज तथ्य सामने आया था कि इस पूरे मामले में अकादमी के ही एक तत्कालीन डिप्टी डायरेक्टर की भूमिका संदिग्ध थी और उनका नाम भी फर्जीवाड़े से जुड़ा पाया गया। इससे न केवल अकादमी की साख पर सवाल खड़े हुए थे, बल्कि देशभर में प्रशासनिक प्रशिक्षण व्यवस्था की सवाल उठ रहे थे।
रूबी चौधरी प्रकरण के उजागर होने के बाद तत्कालीन स्तर पर आंतरिक जांच कराई गई और सत्यापन प्रक्रिया को सख्त करने के दावे किए गए थे। इसके बावजूद ताजा घटनाक्रम, जिसमें गुरुग्राम (हरियाणा) से एक युवक फर्जी यूपीएससी परिणाम के आधार पर प्रशिक्षण के लिए अकादमी पहुंच गया,
ने यह सवाल दोबारा खड़ा कर दिया है कि क्या बीते एक दशक में सत्यापन तंत्र वास्तव में पूरी तरह मजबूत हो पाया है। अकादमी प्रशासन का दावा है कि वर्तमान में सतर्कता के चलते किसी भी संदिग्ध मामले को तुरंत पकड़ा जा रहा है।









