
उत्तराखंड सरकार गांवों से पलायन रोकने और प्रवासियों की घर वापसी के लिए ठोस कदम उठा रही है।
गैरसैंण (चमोली)। उत्तराखंड में गांवों से हो रहा पलायन ऐसा विषय है, जिसका अभी तक पूरी तरह समाधान नहीं हो पाया है। यद्यपि, पिछले नौ वर्षों में पलायन की रोकथाम और प्रवासियों की घर वापसी को उठाए गए कदमों के कुछ सार्थक नतीजे भी आए हैं।
गांव की चौखट से निकलने वाले कदम अब राज्य के शहरों में ही थम रहे हैं। यही नहीं, बड़ी संख्या में गांव लौटे प्रवासी भी गांव में रहकर कामधंधों में रमे हैं, जिनकी संख्या आठ हजार के लगभग है।
इस सबको देखते हुए सरकार का जोर प्रवासियों की घर वापसी पर है, ताकि वे जड़ों से जुड़कर गांव और राज्य के विकास में योगदान दे सकें।
अब वित्तीय वर्ष 2026-27 के बजट में पर्वतीय क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, पशुपालन, पर्यटन, साहसिक पर्यटन जैसे क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किए जाने की पहल को प्रवासियों की घर वापसी के लिए डाली गई मजबूत नींव के तौर पर देखा जा रहा है।
पलायन की चिंताजनक स्थिति को इसी से समझा जा सकता है कि अभी तक राज्य में 1726 गांव पूरी तरह निर्जन हो चुके हैं।
यही नहीं, ऐसे गांवों की बड़ी तादाद है, जिनमें आबादी अंगुलियों में गिनने लायक रह गई है। पलायन निवारण आयोग की रिपोर्ट इसकी तस्दीक करती है। असल में राज्य के गांवों से लोग मजबूरी में पलायन कर रहे हैं।
शिक्षा, स्वास्थ्य व रोजगार के अवसरों के अभाव के चलते बेहतर भविष्य की तलाश में लोग पलायन कर रहे हैं। इस सबको देखते हुए सरकार गांवों में मूलभूत सुविधाओं के विस्तार और आजीविका के अवसर सृजित करने पर ध्यान दे रही है।
साथ ही प्रवासियों को जड़ों से जोड़ने के दृष्टिगत मुख्यमंत्री पलायन रोकथाम योजना, मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना जैसी योजनाएं लागू की गई हैं। यही नहीं, देश-विदेश में रह रहे प्रवासियों से संपर्क और उन्हें गांव गोद लेने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।
इसी कड़ी में वोकल फार लोकल व लोकल टू ग्लोबल की अवधारणा को धरातल पर मूर्त रूप देने के लिए हाउस आफ हिमालयाज की पहल की गई है, जो राज्य के स्थानीय उत्पादों का अंब्रेला ब्रांड है।
इसके पीछे मंशा स्वयं सहायता समूहों और महिलाओं की आय बढ़ाने के साथ ही पलायन की रोकथाम है।
इससे पहाड़ में सम्मानजनक रोजगार एवं उद्यमिता के अवसर सृजित होने से युवा पलायन नहीं करेंगे और प्रवासी भी घर वापसी कर इनसे जुड़ेंगे। इसी को ध्यान में रखते हुए हाउस आफ हिमालयाज के लिए बजटीय प्रविधान किए गए हैं।
इसके साथ ही कृषि व उससे जुड़े क्षेत्रों के अलावा पर्यटन, उद्योग समेत अन्य क्षेत्रों में विभिन्न योजनाओं पर बजट में ध्यान केंद्रित किया गया है। साथ ही वहां मूलभूत सुविधाओं के विस्तार के दृष्टिगत भी कदम उठाने प्रस्तावित हैं।
सीमावर्ती क्षेत्रों के गांव पर भी विशेष ध्यान
चीन और नेपाल की सीमा से सटे उत्तराखंड के गांव भी पलायन के दंश से अछूते नहीं हैं। पलायन निवारण आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक निर्जन हुए गांवों में 26 सीमावर्ती गांव शामिल हैं। अन्य गांवों में भी आबादी कम हुई है।
इसे देखते हुए सरकार ने बजट में सीमावर्ती क्षेत्रों और वहां के गांवों के निवासियों को पर्यटन व साहसिक पर्यटन के माध्यम से आजीविका से जोड़ने पर जोर दिया है।
केंद्र के वाइब्रेंट विलेज कार्यक्रम में शामिल चीन सीमा से सटे राज्य के 51 गांवों के लिए 40 करोड़ रुपये का बजट प्रविधानित किया गया है। उत्तरकाशी के जादूंग समेत अन्य गांवों में अवस्थापना सुविधाएं विकसित करने पर भी सरकार ने ध्यान केंद्रित किया है।









