भाजपा के प्रदेश प्रभारी राम माधव और सह प्रभारी बांसुरी स्वराज व अरविंद मेनन उत्तराखंड में 2027 के चुनावी रण की तैयारी के लिए दो दिवसीय संगठनात्मक प्रवास पर हैं।
देहरादून। उत्तराखंड की सियासत में 2027 का चुनावी रण करीब है, भाजपा ने बिसात पर मोहरे सजाने शुरू कर दिए हैं।
प्रदेश प्रभारी राम माधव और सह प्रभारी बांसुरी स्वराज व अरविंद मेनन का दो दिवसीय प्रवास इसी तैयारी की पहली बड़ी कड़ी है। नई जिम्मेदारी मिलने के बाद तीनों नेताओं का यह पहला संगठनात्मक प्रवास है। पहले दिन प्रदेश पदाधिकारियों, जिलाध्यक्षों के साथ बैठक और दूसरे दिन सातों मोर्चों से संवाद प्रस्तावित है।
संगठन से प्रभारी सह प्रभारी का पहला सवाल यही होगा कि चुनाव की दस्तक पर संगठन कितना सक्रिय, कितना एकजुट और कितना जमीन से जुड़ा है। प्रदेश नेतृत्व की रिपोर्ट और बूथ की वास्तविकता के बीच कोई फासला है तो उसे भी तलाशा जाएगा। 70 विधानसभा क्षेत्रों में कमजोर कड़ियां, पिछली बार हारी सीटें, बूथ समितियों की सक्रियता और कार्यकर्ताओं की भागीदारी इसी पड़ताल के केंद्र में होंगी।
10 सवाल, जिन पर ली जायेगी संगठन से रिपोर्ट
1. बूथ—कागज पर संगठन या जमीन पर ताकत?
चुनाव संगठन की असली परीक्षा बूथ पर होती है। कितने बूथों पर समितियां सक्रिय हैं, पन्ना स्तर तक जिम्मेदारी पहुंची है या नहीं और कार्यकर्ता चुनावी मोड में कितना सक्रिय है, इन सवालों का जवाब केवल जिलों की रिपोर्ट से नहीं, जमीनी फीडबैक से तलाशी जायेगी।
असली सवाल: संगठन की संख्या कितनी है और सक्रियता कितनी?
2. हारी सीटों पर वापसी की जमीन कितनी तैयार?
पिछली हार को सिर्फ आंकड़ा मानने के बजाय उसके कारणों की तलाश की जायेगी। जहां प्रत्याशी, संगठन या स्थानीय समीकरण ने भाजपा को पीछे किया, वहां अब क्या बदला है?
असली सवाल: कितनी हारी सीटों पर वापसी की वास्तविक राजनीतिक जमीन तैयार हुई है?
3. पहाड़ और मैदान, एक फार्मूला या अलग रणनीति?
उत्तराखंड की राजनीति हर क्षेत्र में अलग है। पहाड़ में पलायन, रोजगार, स्वास्थ्य, सड़क और आपदा के सवाल प्रमुख हैं तो मैदानी क्षेत्रों में शहरीकरण, रोजगार, बुनियादी सुविधाएं और स्थानीय सामाजिक समीकरण अलग तरह से असर डालते हैं।
असली सवाल: क्या चुनावी रणनीति क्षेत्र की अलग-अलग राजनीतिक मिजाज के हिसाब से बनी या नहीं?
4. सरकार के काम का वोटर तक कितना असर?
सरकार ने यूसीसी, नकल विरोधी कानून, भू-कानून से लेकर इंफ्रास्ट्रक्चर और कल्याणकारी योजनाओं तक कई बड़े फैसले लज्ये, सरकार का काम जनता के मत में किस रूप में मौजूद है।
असली सवाल: सरकारी उपलब्धियों की राजनीतिक पहुंच कितनी है, यह भाजपा के लिए जनमत में बदल पा रहा है या नहीं?
5. युवा: नई पीढ़ी से संवाद की नई भाषा क्या?
उत्तराखंड में युवा चुनावी राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाएं, शिक्षा, स्वरोजगार और पलायन जैसे सवालों के साथ डिजिटल प्लेटफार्म पर संवाद भी अहम होगा। सातों मोर्चों के साथ बैठक में युवा नेटवर्क और नए मतदाताओं तक पहुंच पर भी चर्चा होगी।
असली सवाल: युवा को सिर्फ मतदाता नहीं, सक्रिय संवाद का हिस्सा कैसे बनाया जाए?
6. महिला-लाभार्थी से संगठनात्मक जुड़ाव?
सरकारी योजनाओं की लाभार्थी महिलाओं तक संगठन की पहुंच कितनी है? महिला मोर्चा, स्वयं सहायता समूहों और स्थानीय सामाजिक नेटवर्क के जरिए संपर्क को किस तरह मजबूत किया जाए,यह भी रणनीति का अहम हिस्सा होगा।
असली सवाल: योजनाओं का लाभ और संगठन का संपर्क एक-दूसरे से कैसे जुड़ें?
7. टिकट-दावेदारी से गुटबाजी तक न पहुंचे संगठन?
चुनाव की आहट के साथ टिकट के दावेदार सक्रिय होंगे। यही वह चरण होगा जब व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं संगठनात्मक अनुशासन की परीक्षा लेंगी। मौजूदा विधायकों, संभावित दावेदारों और स्थानीय नेतृत्व के बीच संतुलन साधना चुनौतीपूर्ण होगा।
असली सवाल: टिकट की दौड़ को संगठन की ताकत बनने से पहले संगठन की चुनौती बनने से कैसे रोका जाए?
8. सरकार-संगठन-संघ,समन्वय कितना जमीन पर?
भाजपा के चुनावी ढांचे में सरकार, संगठन और संघ के बीच संवाद महत्वपूर्ण माना जाता है। लेकिन यह समन्वय बूथ तक कितना पहुंचता है, यही असली कसौटी होगी।
असली सवाल: ऊपर की रणनीति नीचे तक और नीचे का संदेश ऊपर तक कितनी तेजी से पहुंचती है?
9. हिंदुत्व और स्थानीय मुद्दों के बीच संतुलन?
उत्तराखंड में यूसीसी, धर्मांतरण और नकल विरोधी कानून जैसे मुद्दों के साथ रोजगार, पलायन, स्वास्थ्य, शिक्षा और आपदा जैसे सवाल भी मतदाता के सामने हैं। चुनावी नैरेटिव में इन दोनों धाराओं को किस तरह साथ रखा जाए, यह महत्वपूर्ण रणनीतिक सवाल होगा।
असली सवाल: वैचारिक मुद्दों और रोजमर्रा के सवालों के बीच राजनीतिक संतुलन कैसे बने?
10. चुनावी मशीन-रणनीति बूथ तक कितनी तेजी से पहुंचेगी?
सबसे बड़ा सवाल संगठन की कमान और उसकी गति का है। प्रदेश से जिला, विधानसभा, मंडल, शक्ति केंद्र और बूथ तक जिम्मेदारी कितनी स्पष्ट होगी? केंद्रीय नेतृत्व का संदेश कितनी जल्दी स्थानीय कार्यकर्ता तक पहुंचेगा और वहां से फीडबैक वापस आएगा?
असली सवाल: क्या संगठन चुनाव आते-आते एक ऐसी मशीनरी में बदल पाएगा, जिसमें हर स्तर की भूमिका स्पष्ट हो?
तीन सारथी, तीन अलग नजरें
राम माधव का अनुभव राष्ट्रीय संगठन और राजनीतिक रणनीति का है, जबकि बांसुरी स्वराज और अरविंद मेनन सह प्रभारी के रूप में अलग-अलग संगठनात्मक जिम्मेदारियां संभालेंगे। भाजपा ने उत्तराखंड में पहली बार एक प्रभारी के साथ दो सह प्रभारियों की व्यवस्था की है।
ऐसे में तीनों का पहला प्रवास केवल परिचय और समीक्षा तक सीमित नहीं रहेगा, जिलों और मोर्चों से मिलने वाला फीडबैक आगे विधानसभा और बूथवार तैयारी का आधार बनेग। आज तैयार रणनीति और गांव-कस्बे के बूथ की वास्तविकता के बीच की दूरी इस पूरी कवायद का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होगी।
सबसे बड़ा सवाल: रिपोर्ट क्या कहेगी?
दो दिन की बैठकों के बाद सबसे महत्वपूर्ण जमीनी रिपोर्ट होगी। कौन से जिले मजबूत हैं, कहां बूथ निष्क्रिय हैं, किन विधानसभा क्षेत्रों में संगठन को अतिरिक्त मेहनत चाहिए, किन वर्गों से संवाद कमजोर है और कहां स्थानीय नेतृत्व को लेकर असंतोष है,इन सवालों की सूची जितनी साफ होगी, 2027 का रोडमैप उतना ही स्पष्ट होगा।
यानी तीनों सारथियों के सामने चुनौती सिर्फ चुनाव की तैयारी शुरू करने की नहीं है। चुनौती यह पता लगाने की है कि भाजपा का चुनावी रथ इस समय वास्तव में कहां कहां खड़ा है, कहां पहिए मजबूत हैं और कहां रास्ता अभी बनना बाकी है।