Big Breaking:-आईसीएआर रिपोर्ट में खतरनाक खुलासा, उत्तराखंड के नौ जिलों में खेती पर मंडराया संकट

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की रिपोर्ट के अनुसार, उत्तराखंड के नौ पर्वतीय जिले जलवायु परिवर्तन के कारण कृषि संकट का सामना कर रहे हैं।

देहरादून। विषम भूगोल वाले उत्तराखंड में खेती पहले ही अनेक झंझावत से जूझ रही है और अब जलवायु परिवर्तन के रूप में नया संकट खड़ा हो गया है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) की अध्ययन रिपोर्ट तो इसी ओर इशारा कर रही है।

इसमें राज्य के सात पर्वतीय जिलों को अत्यधिक जोखिम और दो को उच्च जोखिम श्रेणी में रखा गया है। जलवायु परिवर्तन के चलते वहां जल स्रोत तो सूख ही रहे, मिट्टी में नमी भी अप्रत्याशित रूप से घट रही है। ऐसे में पहाड़ में सिंचाई सुविधा के अभाव में खेती की लागत बढ़ने के साथ ही उत्पादन में कमी की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता।

खेत-खलिहान बंजर में तब्दील

उत्तराखंड में पलायन के कारण गांव खाली हो रहे तो खेत-खलिहान बंजर में तब्दील। जो खेती हो भी रही है, वह मौसम की मार, वन्यजीवों से क्षति समेत अन्य कारणों से बुरी तरह प्रभावित हुई है। राज्य गठन के समय यहां खेती का रकबा 7.70 लाख हेक्टेयर था, जिसमें 2.43 लाख हेक्टेयर की कमी आई है।

इसमें भी 2.08 लाख हेक्टेयर परती भूमि है। उस पर सिंचाई की तस्वीर देखें तो कुल सिंचित क्षेत्रफल 3.01 लाख हेक्टेयर है। इसमें मैदानी क्षेत्र में 90.61 प्रतिशत और पर्वतीय क्षेत्र में 9.39 प्रतिशत ही सिंचित क्षेत्र है।

इन परिस्थितियों में पहाड़ में खेती सिमट रही है और अब जलवायु परिवर्तन के खतरों से यह भी अछूती नहीं रही है। आईसीएआर की अध्ययन रिपोर्ट में यह बात सामने आई है। नेशनल इनोवेशन इन क्लाइमेट रेजिलिएंट एग्रीकल्चर के तहत देश के 201 जिलों में कराये गए अध्ययन के निष्कर्ष ने खेती के लिए खतरे की घंटी बजाई है। इसमें 109 जिलों को संवेदनशील श्रेणी में रखा गया है, जिनमें उत्तराखंड के नौ जिले शामिल हैं।

जोखिम श्रेणी वाले जिले

राज्य के रुद्रप्रयाग, टिहरी, उत्तरकाशी, अल्मोड़ा, चंपावत, बागेश्वर व पिथौरागढ़ जिले अत्यधिक जोखिम श्रेणी में हैं। पौड़ी व चमोली जिलों को उच्च जोखिम श्रेणी में रखा गया है।

इसलिए बढ़ा खतरा

रिपोर्ट के मुताबिक इन जिलों में मिटटी में नमी लगातार घट रही है। पर्वतीय क्षेत्रों में कहीं अत्यधिक तो कहीं नाममात्र की वर्षा, कम बर्फबारी और सूखते जलस्रोतों के कारण खेती बुरी तरह प्रभावित हो रही है। स्थिति यह है कि जिन प्राकृतिक स्रोतों से सालभर पानी मिलता था वे वर्षाकाल तक सिमट गए हैं। ऐसे में सिंचाई पर निर्भरता बढ़ी है, लेकिन पहाड़ में सिंचाई के साधन नाममात्र को ही हैं। नतीजतन चिंता व चुनौती दोनों बढ़ गई हैं।

आईसीएआर की अध्ययन रिपोर्ट के आलोक में केंद्र के जो भी दिशा-निर्देश आएंगे, उसके आधार पर इन जिलों में कदम उठाए जाएंगे। सिंचाई सुविधा बढ़ाने के लिए भी प्रयास किए जाएंगे।
– दिनेश कुमार, कृषि निदेशक, उत्तराखंड

Ad Ad

सम्बंधित खबरें