
प्रारंभिक शिक्षा निदेशक के साथ हुई मारपीट का विवाद विधायक उमेश शर्मा काऊ की माफी के साथ खत्म हो गया है.
देहरादून: उत्तराखंड में प्रारंभिक शिक्षा निदेशक के साथ हुई मारपीट का मामला आखिरकार विधायक उमेश शर्मा की सार्वजनिक माफी के साथ शांत हो गया है. इस पूरे घटनाक्रम ने न सिर्फ शिक्षा विभाग को झकझोर दिया, बल्कि राज्य की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था को भी कटघरे में खड़ा कर दिया था.
21 फरवरी से शुरू हुआ यह विवाद धीरे-धीरे सड़कों तक पहुंचा और शिक्षकों के व्यापक आंदोलन का रूप ले लिया. हालांकि अब मामला शांत हो गया, जिसके बाद सरकार और शासन-प्रशासन ने राहत की सास ली.
दरअसल, देहरादून में स्थित उत्तराखंड शिक्षा निदेशालय में प्रारंभिक शिक्षा निदेशक के साथ हुई मारपीट की घटना से शिक्षा विभाग के शिक्षक और मिनिस्ट्रीयल कर्मियों में भारी आक्रोश फैल गया था. देखते ही देखते शिक्षकों ने कार्य बहिष्कार का ऐलान कर दिया और धरना-प्रदर्शन शुरू हो गया था.
राजनीतिक हलकों में भी हलचल मच गई थी: आंदोलन की तीव्रता इतनी बढ़ गई कि इसका असर प्रदेश की शैक्षणिक व्यवस्था पर साफ नजर आने लगा. इस पूरे प्रकरण में मामला भाजपा के विधायक उमेश शर्मा काऊ से जुड़ा होने के कारण राजनीतिक हलकों में भी हलचल मच गई थी.
सत्ता पक्ष भारतीय जनता पार्टी और सरकार दोनों दबाव में आ गए, जबकि विपक्षी कांग्रेस ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाते हुए शिक्षकों का खुलकर समर्थन किया. कांग्रेस ने इसे सरकारी तंत्र की विफलता बताते हुए सत्ता पक्ष पर तीखा हमला बोला था.
आरोपियों की गिरफ्तारी से भी संतुष्ट नहीं हुई कर्मचारी: मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने भाजपा विधायक के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया और उनके चार समर्थकों को गिरफ्तार भी किया. इसके बावजूद शिक्षा विभाग के अधिकारी और कर्मचारी संतुष्ट नहीं हुए और उन्होंने कार्य बहिष्कार जारी रखा.
विधायक उमेश शर्मा ने मांगी सार्वजनिक माफी: शिक्षकों का कहना था कि जब तक उन्हें सम्मान और सुरक्षा की गारंटी नहीं दी जाती, तब तक वे काम पर नहीं लौटेंगे. आंदोलन के लगातार तेज होते स्वरूप और शिक्षा व्यवस्था के ठप पड़ने के खतरे को देखते हुए आखिरकार सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ा. दबाव की इस स्थिति में विधायक उमेश शर्मा काऊ ने सार्वजनिक रूप से शिक्षा विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों से माफी मांगी.
सरकारी कर्मचारियों की सुरक्षा के लिए SOP तैयार: उनकी इस माफी को शिक्षकों ने एक नैतिक जीत के रूप में लिया, जिसके बाद आंदोलन को खत्म करने का निर्णय लिया गया. इस पूरे घटनाक्रम के दौरान सरकार ने एक और अहम कदम उठाया. सरकारी कर्मचारियों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए एक मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार की गई, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो.
शिक्षकों ने चेतावनी भी दी: शिक्षकों का कहना है कि यह SOP उनके लिए एक बड़ी उपलब्धि है और इससे उन्हें कार्यस्थल पर सुरक्षित माहौल मिलेगा. हालांकि शिक्षकों ने आंदोलन समाप्त करते समय एक चेतावनी भी दी. उनका कहना है कि यदि विधायक की ओर से दर्ज कराए गए मुकदमे के सिलसिले में पुलिस शिक्षकों को परेशान करती है,
तो वे बिना किसी पूर्व सूचना के फिर से धरना-प्रदर्शन शुरू करने को मजबूर होंगे. शिक्षकों ने स्पष्ट किया कि फिलहाल सरकार ने उनकी सभी मांगों को पूरा किया है, इसलिए वे कार्य बहिष्कार खत्म कर रहे हैं, लेकिन हालात बिगड़ने पर वे दोबारा सड़कों पर उतर सकते हैं.
यह पूरा प्रकरण प्रशासनिक सम्मान, राजनीतिक दबाव और कर्मचारी सुरक्षा के सवालों को एक बार फिर सामने ले आया है. विधायक की माफी के साथ भले ही फिलहाल मामला शांत हो गया हो, लेकिन यह घटना उत्तराखंड की राजनीति और प्रशासन के लिए एक बड़ा सबक बनकर सामने आई है.
पूरा मामला जानिए क्या है: बता दें कि बीते शनिवार 21 फरवरी को बीजेपी विधायक उमेश शर्मा अपने समर्थकों के साथ प्रारंभिक शिक्षा निदेशक अजय नौडियाल के दफ्तर में पहुंचे थे. विधायक उमेश शर्मा ने अपने विधानसभा क्षेत्र में स्थित एक स्कूल का नाम बदलवाना चाहते थे, जिसको लेकर ही वहां पर बहस हो गई और बात मारपीट तक पहुंच गई. इस दौरान अजय नौडियाल के काफी चोट आई थी.








