पूर्व सीडीएस जनरल अनिल चौहान ने कहा कि भविष्य के युद्ध केवल सैनिकों के साहस से नहीं, बल्कि तकनीक, सूचना और त्वरित निर्णयों से जीते जाएंगे। उन्होंने ‘लर्न, अनलर्न एंड रीलर्न’ की संस्कृति अपनाने और राष्ट्रीय सुरक्षा को पूरे समाज की जिम्मेदारी बताया।
देहरादून। भविष्य के युद्धों में जीत केवल सैनिकों के साहस या अत्याधुनिक हथियारों से तय नहीं होगी। युद्ध अब तकनीक, सूचना, नेटवर्क, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और पल-पल बदलते हालात के अनुरूप लिए गए फैसलों से जीते जाएंगे।
ऐसे में पिछली लड़ाई की रणनीति के भरोसे अगला युद्ध नहीं जीता जा सकता। सेना को लगातार बदलना, सीखना और नई परिस्थितियों के अनुरूप खुद को ढालना होगा। यह बात पूर्व सीडीएस जनरल अनिल चौहान ने आल इंडिया गोरखा एक्स सर्विसमेन एसोसिएशन की ओर से आयोजित सम्मान एवं आभार समारोह में कही।
युद्ध में सफलता केवल हथियारों से नहीं मिलती
गढ़ी कैंट स्थित दून सैनिक इंस्टीट्यूट में उन्होंने कहा कि किसी भी युद्ध में सफलता केवल हथियारों से नहीं मिलती। सटीक रणनीति, आधुनिक हथियार और उपकरण, उच्चस्तरीय प्रशिक्षण, तीनों सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल, सही समय पर तैनाती और त्वरित निर्णय ही जीत की असली कुंजी हैं।
युद्ध में विजय किसी भी राष्ट्र के लिए विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता है, क्योंकि हार केवल सैन्य पराजय नहीं होती, बल्कि उससे देश का इतिहास, प्रतिष्ठा और वैश्विक पहचान भी प्रभावित होती है।जनरल चौहान ने वर्ष 2025 में पाकिस्तान के साथ हुए आपरेशन सिंदूर का उल्लेख करते हुए कहा कि इस अभियान ने आधुनिक युद्ध की नई परिभाषा गढ़ी।
यह नान-कॉन्टैक्ट, नेटवर्क आधारित और मल्टी-डोमेन युद्ध था, जिसमें पारंपरिक और गैर-पारंपरिक सैन्य क्षमताओं का प्रभावी समन्वय किया गया। उन्होंने कहा कि अभियान की सफलता का सबसे बड़ा आधार तीनों सेनाओं के बीच मजबूत जॉइंटनेस और इंटीग्रेशन रहा।
संचार नेटवर्क, एयर डिफेंस सिस्टम और अन्य सैन्य संसाधनों के बीच निर्बाध सूचना आदान-प्रदान से युद्धक्षेत्र की वास्तविक स्थिति का लगातार आकलन संभव हुआ। बेहतर सिचुएशनल अवेयरनेस और बैटलफील्ड ट्रांसपेरेंसी के कारण भारत हर चरण में बढ़त बनाए रखने और अनुकूल समय पर अभियान को सफलता के साथ पूरा करने में सक्षम रहा।
उन्होंने कहा कि आने वाले समय में युद्ध केवल थल, जल और वायु तक सीमित नहीं रहेंगे। साइबर स्पेस, अंतरिक्ष, सूचना और कॉग्निटिव डोमेन भी निर्णायक भूमिका निभाएंगे। इसलिए नई तकनीकों, आधुनिक हथियार प्रणालियों और बदलती सैन्य रणनीतियों को तेजी से अपनाना समय की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि कोई भी दो युद्ध एक जैसे नहीं होते। एक रणनीति केवल एक बार प्रभावी हो सकती है। इसलिए ‘लर्न, अनलर्न एंड रीलर्न’ की संस्कृति अपनानी होगी, यानी पुरानी सोच और कार्यप्रणाली को छोड़कर नई चुनौतियों के अनुरूप खुद को लगातार तैयार करना होगा।
पूर्व सीडीएस ने कहा कि 45 वर्षों की सेवा में यदि कोई चीज नहीं बदली, तो वह भारतीय सेना के प्रति देशवासियों का अटूट विश्वास है। यह विश्वास किसी व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि पूरी भारतीय सेना और उसकी गौरवशाली परंपराओं का सम्मान है।
वर्तमान पीढ़ी के सैनिकों का दायित्व है कि वे अपने आचरण और कार्यों से इस अमूल्य विरासत को और मजबूत करें।उन्होंने कहा कि मौजूदा भू-राजनीतिक परिस्थितियां भारत के लिए चुनौती के साथ अवसर भी हैं। यह देश के लिए अमृतकाल है और इसी दौर में भारत अपनी नई दिशा तय कर सकता है। राष्ट्रीय सुरक्षा केवल सेना का विषय नहीं, बल्कि पूरे समाज की साझी जिम्मेदारी है। प्रत्येक नागरिक को राष्ट्रहित में अपनी भूमिका निभानी होगी।
जनरल चौहान ने कहा कि देश में सामरिक सोच को बढ़ावा देने की जरूरत है। रणनीतिक विमर्श केवल दिल्ली तक सीमित नहीं रहना चाहिए। राज्य भी राष्ट्रीय सुरक्षा और सामरिक चिंतन के महत्वपूर्ण केंद्र बन सकते हैं। उत्तराखंड का उल्लेख करते कहा कि हिमालय सदियों से ज्ञान और चिंतन की भूमि रहा है। जिस प्रकार गंगा और यमुना का उद्गम उत्तराखंड से होकर पूरे देश को जीवन देता है, उसी प्रकार यहां से निकले विचार भी देश की सामरिक सोच को नई दिशा दे सकते हैं।
उन्होंने कहा कि भारतीय सेना के प्रति देशवासियों का अटूट विश्वास सबसे बड़ी पूंजी है। इस विश्वास को और मजबूत बनाना सेना और समाज, दोनों की साझा जिम्मेदारी है।