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Big Breaking:-सनातन, राजनीति और ‘टैग’ की बहस: आस्था, पहचान और वैचारिक स्पष्टता

सनातन, राजनीति और ‘टैग’ की बहस: आस्था, पहचान और वैचारिक स्पष्टता*

*उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का पंचमुखी हनुमान मंदिर में दर्शन और “जय बजरंग बली” का उद्घोष केवल एक धार्मिक आस्था का सार्वजनिक प्रदर्शन नहीं था, बल्कि यह उस वैचारिक बहस में एक स्पष्ट हस्तक्षेप भी था, जो इन दिनों देश की राजनीति में सनातन बनाम सेक्युलर विमर्श के रूप में तेज़ी से उभर रही है।*

कोटद्वार प्रकरण की पृष्ठभूमि में मुख्यमंत्री की यह उपस्थिति राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। संदेश स्पष्ट था—धामी न केवल प्रशासनिक निर्णयों में, बल्कि वैचारिक स्तर पर भी अपने पक्ष को खुलकर रखने से पीछे नहीं हटते।

मुख्यमंत्री का यह कथन कि “सनातन संस्कृति को किसी टैग की ज़रूरत नहीं” अपने आप में एक सशक्त वैचारिक वक्तव्य है। बीते वर्षों में ‘सनातन’ को कभी बहुसंख्यकवाद के फ्रेम में,

तो कभी सेक्युलर मूल्यों के प्रतिपक्ष में खड़ा कर देखने की प्रवृत्ति बढ़ी है। धामी का बयान इसी दृष्टिकोण को चुनौती देता है और यह रेखांकित करता है कि सनातन परंपरा किसी राजनीतिक लेबल की मोहताज नहीं है।

भारतीय सभ्यता में सनातन केवल पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं रहा है। यह सामाजिक आचरण, सह-अस्तित्व, कर्तव्यबोध और मानवता के संरक्षण का आधार रहा है। धामी द्वारा सनातन परंपरा के मानवीय और समरसतावादी पक्ष पर दिया गया ज़ोर इतिहास और दर्शन—दोनों की ओर संकेत करता है।

स्वाभाविक है कि आलोचक इसे राजनीतिक ध्रुवीकरण के चश्मे से देखें। लेकिन समर्थकों के लिए यह सांस्कृतिक आत्मविश्वास और वैचारिक स्पष्टता की अभिव्यक्ति है। प्रश्न यह नहीं है कि कोई निर्वाचित जनप्रतिनिधि मंदिर जाता है या नहीं, बल्कि यह है कि वह सार्वजनिक जीवन में अपनी सांस्कृतिक पहचान को किस प्रकार प्रस्तुत करता है।

आज की राजनीति में शब्द, प्रतीक और उद्घोष साधारण नहीं रह गए हैं। “जय बजरंग बली” अब केवल श्रद्धा का वाक्य नहीं, बल्कि वैचारिक पक्षधरता का संकेत भी बन चुका है। ऐसे समय में धामी का यह कदम यह दर्शाता है कि वे इस बहस में तटस्थ रहने के बजाय अपना पक्ष स्पष्ट रूप से रखना चाहते हैं।

अंततः, सनातन बनाम सेक्युलर की बहस से आगे बढ़कर असली सवाल यह है कि क्या हम विविधताओं के साथ सह-अस्तित्व की उस भावना को जीवित रख पा रहे हैं, जिसकी बात सनातन परंपरा स्वयं करती है। यदि राजनीति इस मूल भावना को समझ सके, तो संभव है कि ‘टैग’ अपने आप ही अप्रासंगिक हो जाएँ।

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