Big Breaking:-देश का सबसे पुराना शिपयार्ड अब सबसे एडवांस, बना भारत की समुद्री शक्ति का नया केंद्र

हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड (HSL) भारत की समुद्री रक्षा क्षमता में नई ऊर्जा भर रहा है। विशाखापट्टनम स्थित यह शिपयार्ड आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर, उन्नत तकनीकों जैसे एंटी-ड्रोन सिस्टम और डिजिटल ट्विन को अपना रहा है।

नौसेना के लिए पांच फ्लीट सपोर्ट शिप का निर्माण भारत की समुद्री संप्रभुता और आत्मनिर्भरता को मजबूत कर रहा है, जिससे यह वैश्विक समुद्री शक्ति का केंद्र बन रहा है।

देहरादून। भारत की समुद्री राक्षा क्षमता को नई दिशा देने में हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड निर्णायक भूमिका निभा रहा है। विशाखापट्टनम स्थित यह देश का सबसे पुराना शिपयार्ड अब अपने इतिहास के सबसे उन्नत, सशक्त और सबसे तेज गति वाले दौर में नजर आ रहा है।

इसकी उत्पादन क्षमता, तकनीकी दक्षता व भविष्य की परियोजनाओं की रफ्तार ने इसे भारतीय समुद्री शक्ति का एक अनिवार्य स्तंभ बना दिया है। शिपयार्ड आज सिर्फ जहाज नहीं बना रहा, बल्कि भारत की समुद्री संप्रभुता, नौसैनिक आत्मनिर्भरता और रणनीतिक तैयारियों का मजबूत प्रहरी बन चुका है।

बीते कुछ वर्षों में हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड (एचएसएल) ने अपने इनफ्रास्ट्रक्चर को जिस तरह बदला है, वह किसी भी आधुनिक वैश्विक डिफेंस शिपयार्ड की बराबरी करता है। प्रेस सूचना ब्यूरो (पीआइबी) देहरादून की ओर से विशाखापट्टनम गए पत्रकारों के समूह ने जब एचएसएल का दौरा किया तो देखा कि भारी जहाजों को उठाने में सक्षम नई गालियथ क्रेन, स्वचालित स्टील कटिंग लाइनें, उन्नत सीपवे सिस्टम, डिजिटल कंट्रोल सुविधा, श्री-डी डिजाइन और एआइ आधारित प्रोजेक्ट मानिटरिंग, इन सभी ने जहाज निर्माण की गति और गुणवत्ता को अभूतपूर्व ऊंचाई दी है।

सामरिक क्षमता में भर रहा नई ऊर्जा

एचएसएल के वरिष्ठ जनसंपर्क अधिकारी इनायतुल्ला बेग ने जानकारी दी कि आने वाले समय में शिपयार्ड डिजिटल ट्विन तकनीक, रोबोटिक वेल्डिंग और हाई-स्पीड ब्लाक असेंबली जैसे नए तकनीकी विस्तार भी शामिल करने जा रहा है, जिससे इसकी क्षमता और बढ़ जाएगी। देश की रक्षा नीति में बढ़ती वैश्विक साझेदारियों के बीच एचएसएल विदेशी और स्वदेशी रक्षा कंपनियों के साथ तकनीकी सहयोग बढ़ा रहा है।

यूरोपीय डिजाइन सहयोग, एशियाई शिपयार्डों के साथ कौशल आदान-प्रदान और भारतीय रक्षा उद्योग के साथ संयुक्त परियोजनाएं आने वाले समय में जहाजों के निर्यात के अवसर भी बढ़ा सकती हैं। यह परिवर्तन सिर्फ एक उद्योग का नहीं,

बल्कि भारत की समुद्री शक्ति के नए युग का आरंभ दिखाई दे रहा है, जिसने विश्व को यह संदेश दे दिया है कि भारत अब किसी भी स्तर की समुद्री चुनौती का सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार है और समुद्री रणनीति का केंद्रीय शक्ति केंद्र बनने जा राय है।

पनडुब्बी तकनीक में ड़ी रणनीतिक योजना का हिस्सा

शिपयार्ड पनडुब्बी तकनीक में भी भारत की बड़ी रणनीतिक योजना का हिस्सा बन चुका है। सबमरीन ओवरहाल, लाइफ-एक्सटेंशन, उन्नत सेंसरों के एकीकरण और भविष्य की माड्यूलर पनडुब्बी प्रणालियों की दिशा में एचएसएल को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी जा रही है।

अधिकारियों ने बताया कि आने वाले वर्षों में यह शिपयार्ड भारत की अंडरवाटर क्षमता को मजबूत करने वाले प्रमुख केंद्रों में शामिल होगा। पर्यावरण-अनुकूल ग्रीन शिपबिल्डिंग के क्षेत्र में भी अग्रिम बढ़त हासिल कर रहा है। हाइड्रोजन फ्यूल आधारित टग्स, हाइब्रिडपोर्ट वैसल और स्मार्ट पोर्ट प्रोजेक्टों पर काम, इसे भविष्य की वैश्विक जरूरतों के अनुरूप स्थापित कर रहे है। यह पहल भारत को हरित समुद्री तकनीक में एक प्रतिस्पर्धी खिलाड़ी भी बना रही है।

युद्ध क्षेत्र को ध्यान में रखकर तकनीक का उपयोग

एचएसएल न केवल बड़े सतही जहाजों का निर्माण कर रहा है, बल्कि भविष्य के समुद्री युद्ध क्षेत्र को ध्यान में रखते हुए नई तकनीकों पर भी काम कर रहा है। अ धुनिक युद्ध में ड्रोन बड़ी चुनौती बन चुके हैं और इसी खतरे को देखते हुए वह नौसेना के लिए उन्नत एंटी-ड्रोन सिस्टम विकसित कर रहा है।

निगरानी रडार, जामिग तकनीक, इंटरसेप्टर माड्यूल और इंटीग्रेटेड शिप-प्रोटेक्शन सिस्टम के साथ यह तकनीक भारतीय युद्धपोतों की सुरक्षा को कई गुना मजबूत करेंगी। इसके साथ ही लंबी दूरी की सुरक्षित संचार प्रणालियों पर भी कार्य जारी है, जिससे समुद्र में मिशन-क्रिटिकल आपरेशनों के दौरान बेहतर समन्वय सुनिश्चित होगा।

नौसेना के लिए तैयार हो रहे एफएसएस

एचएसएल में भारतीय नौसेना के लिए तैयार किए जा रहे पांच अत्याधुनिक फ्लीट सपोर्ट शिप (एफएसएस) इस बदलाव का सबसे बड़ा प्रमाण है। 44,000 टन से अधिक क्षमता वाले ये विशाल जहाज समुद्र में तैनात युद्धपोतों को ईंधन, गोला-बारूद, पानी और आवश्यक सामग्रियां उपलब्ध कराते हुए भारत की ब्लू-वाटर क्षमता को सीधे मजबूत करेंगे।

इन जहाजों में आधुनिक आरएएस तकनीक का प्रयोग किया जा रहा है, जिससे समुद्र में आपूर्ति अधिक सुरक्षित और तेज होगी। परियोजना की रफ्तार पहले से बेहतर है और शिपयार्ड में माड्यूल निर्माण तय समय से आगे बढ़ रहा है। रक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक, यह परियोजना भारत की समुद्री रणनीतिक स्वायत्तता की नींव को और मजबूत करेगी।

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