उत्तराखण्ड

Big Breaking:-केदारनाथ के रास्तों से लेकर गंगा के मायके तक पर्यटकों ने छोड़ा हजारों टन कचरा, वन्यजीवों के पेट तक पहुंचा प्रदूषण

केदारनाथ के रास्तों से लेकर गंगा के मायके तक पर्यटकों ने छोड़ा हजारों टन कचरा, वन्यजीवों के पेट तक पहुंचा प्रदूषण

तीर्थयात्रा के दौरान बढ़ता कचरा पर्यावरण के लिए खतरा बन रहा है. नदियों के अलावा कचरा वन्यजीवों तक भी पहुंच रहा है.

देहरादून: उत्तराखंड में पर्यटन और तीर्थाटन राज्य की अर्थव्यवस्था का बड़ा आधार है. चारधाम के अलावा, हेमकुंड साहिब यात्रा, हरिद्वार-ऋषिकेश, नैनीताल, मसूरी और दूसरे पर्यटन स्थलों तक बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक पहुंच रहे हैं. लेकिन पर्यटकों की बढ़ती आमद के साथ एक दूसरा आंकड़ा भी लगातार चिंता बढ़ा रहा है. ये आंकड़ा पहाड़ों में बढ़ते कचरे का है.

पहाड़ों में एक प्लास्टिक की बोतल या पैकेट को नीचे लाकर निस्तारित (Dispose) करना मैदानी इलाकों की तुलना में कहीं ज्यादा मुश्किल है. हरिद्वार जैसे धार्मिक शहरों में कुछ ही दिनों में हजारों टन कचरा जमा हो जाता है. यानी पर्यटन जिस रफ्तार से उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था को गति दे रहा है, उसी के साथ उसका पर्यावरणीय दबाव भी बढ़ रहा है. सितंबर 2026 में केंद्र की ओर से उत्तराखंड के ठोस कचरा प्रबंधन पर हुई चर्चा में भी चारधाम और पर्यटन क्षेत्रों के लिए विशेष ठोस प्रबंधन योजना की जरूरत पर जोर दिया गया. इससे ये अंदाज लगाया जा सकता है कि पहाड़ों से लेकर मैदान के पर्यटक स्थलों में कूड़ा कितनी बड़ी समस्या बनता जा रहा है.

चारधाम में करीब 798 टन कचरे का आंकड़ा: चारों धाम नगर पंचायतों आंकड़ों के मुताबिक, इस साल (2026) यात्रा शुरू होने से 27 सितंबर तक केदारनाथ, बदरीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री से कुल मिलाकर करीब 798 टन कचरा एकत्र किया गया. इसमें अकेले बदरीनाथ में 393 टन, केदारनाथ धाम क्षेत्र में 32 टन और केदारनाथ पैदल मार्ग पर करीब 270 टन ठोस कचरा शामिल है. गंगोत्री में 98 टन कचरा और यमुनोत्री यात्रा क्षेत्र में 4.85 टन प्लास्टिक कचरा एकत्र किए जाने का आंकड़ा सामने आया है.

इन आंकड़ों में सबसे बड़ा सवाल केवल ये नहीं है कि कितना कचरा जमा हुआ, बल्कि ये भी है कि इतनी ऊंचाई वाले संवेदनशील हिमालयी क्षेत्रों से इस कचरे को नीचे लाकर अलग-अलग करना, उसका परिवहन करना और फिर वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण करना कितना कठिन है. चारधाम क्षेत्र ऊंचाई पर स्थित हैं. कई स्थानों पर यात्रा सीमित महीनों में होती है, इसलिए थोड़े समय में पैदा होने वाला भारी कचरा स्थानीय व्यवस्था पर अचानक बड़ा दबाव डालता है

बदरीनाथ में पानी की बोतलें बनीं बड़ी चुनौती: बदरीनाथ में इस यात्रा सीजन के दौरान 393 टन कचरा जमा हुआ है. इसमें करीब 161 टन सूखा कूड़ा बताया गया है. कचरे की प्रोसेसिंग के दौरान करीब 24 टन प्लास्टिक अलग किया गया. इसमें पानी की बोतलों की संख्या सबसे अधिक रही. यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पहाड़ी धार्मिक स्थलों पर पीने के पानी के लिए इस्तेमाल होने वाली प्लास्टिक बोतलें इस्तेमाल के बाद कूड़े का हिस्सा बनती हैं. उनके वापस नीचे आने की पूरी व्यवस्था न होने पर यही प्लास्टिक रास्तों, नालों, नदी-नालों और आसपास के प्राकृतिक क्षेत्रों तक पहुंच जाती है.

केदारनाथ मार्ग में भी भारी कचरा: केदारनाथ की चुनौती सिर्फ मंदिर क्षेत्र तक सीमित नहीं है. धाम नगर पंचायत क्षेत्र में करीब 32 टन सॉलिड वेस्ट जमा हुआ, जिसमें 20 टन प्लास्टिक कचरा बताया गया. गौरीकुंड से केदारनाथ तक के पैदल मार्ग की सफाई व्यवस्था संभालने वाली संस्था की ओर से करीब 270 टन सॉलिड वेस्ट एकत्र किए जाने की जानकारी दी गई है. यानि तीर्थस्थल तक पहुंचने वाले रास्ते भी कचरे पटे पड़े हैं. हाल ही में केदारनाथ से पैदल यात्रा करके आईं पल्लवी कहती हैं,

रास्ते में प्लास्टिक की बोतल के अलावा कीचड़ और अन्य कूड़ा भी बहुत पड़ा था. कुछ झरने नदी के साथ नीचे बह रहे थे. ये देखकर मन बहुत दुखी हुआ.

कूड़ा बेहतर तरीके से उठ रहा है. मंदिर के आसपास हम कूड़े को जमा नहीं होने देते हैं. लगातार मंदिर के आसपास और पूरे क्षेत्र में सफाई चलती रही है. लेकिन आने वाले भक्तों की भागीदारी के बिना कुछ भी संभव नहीं है. इस लिए हमें ये सोचना होगा कि इतने ऊपर आकर हम बेवजह कूड़ा न फेंके

गंगोत्री और यमुनोत्री में भी कूड़ा कम नहीं: गंगोत्री में यात्रा सीजन के दौरान करीब 98 टन कचरा इकट्ठा हुआ. इसमें से 22 टन प्लास्टिक को रिसाइकिल किए जाने और करीब ढाई टन खाद तैयार किए जाने के बारे में धाम नगर पंचायत ने बताई. यमुनोत्री में करीब 4.85 टन प्लास्टिक कचरे को इकट्ठा करके निस्तारण किया गया. गंगोत्री और यमुनोत्री में कचरे को लेकर पर्यावरणविद् इसलिए भी चिंतित हैं, क्योंकि ये क्षेत्र हिमालयी जलधाराओं के बेहद संवेदनशील हिस्सों में आते हैं. पर्यावरणविद् अनिल जोशी कहते हैं

प्लास्टिक और दूसरे कचरे का सही निस्तारण नहीं होने से मिट्टी, पानी और हिमालयी इकोसिस्टम बहुत हद तक प्रभावित हो सकता है. इसके परिणाम बेहद खतरनाक हो सकते हैं. साल 2026 में किए गए एक फील्ड असेसमेंट ने भी गंगोत्री और यमुनोत्री कॉरिडोर में बढ़ता कचरा और कचरा प्रबंधन की चुनौतियों को प्रमुख पर्यावरणीय मुद्दों के रूप में चिन्हित किया है. इसके साथ ही संयुक्त राष्ट्र भी पहाड़ों के कूड़े पर अपनी चिंता बार बार जता रहा है.

हरिद्वार में कांवड़ के बाद सामने आया था कचरे का पहाड़: पहाड़ से मैदान तक तस्वीर बहुत अलग नहीं है. हरिद्वार कांवड़ मेले में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की आवाजाही के बाद नगर निगम के सामने शहर को कचरे से मुक्त करने की चुनौती रहती है. इस साल हुए कांवड़ मेले में आंकड़ों के मुताबिक, मेले के समय करीब 7 हजार मीट्रिक टन कचरा इकट्ठा हुआ, जिसमें करीब 4 से 4.5 हजार मीट्रिक टन अतिरिक्त कचरा कांवड़ यात्रा से जुड़ा बताया गया था. घाटों पर ही करीब 4,500 मीट्रिक टन कचरा जमा होने की जानकारी दी गई. नगर निगम हरिद्वार ने हरकी पैड़ी समेत प्रमुख घाटों पर सफाई के लिए बड़ी संख्या में कर्मचारियों को लगाया. प्लास्टिक और कपड़े के कचरे को अलग करके प्रोसेसिंग प्लांट और एमआरएफ सेंटर तक भेजने की व्यवस्था की गई थी

गंगा समेत अन्य नदियों के लिए खतरा है ये कचरा: हरिद्वार में गंगा को स्वच्छ रखने के लिए काम करने वाले रामेश्वर गौड़ कहते हैं

2020 के हरिद्वार बेसलाइन आकलन में गंगा किनारे और शहर के विभिन्न हिस्सों में प्लास्टिक लीकेज के हॉटस्पॉट दर्ज किए गए थे. रिपोर्ट में नदी के किनारों, नालों और खुले स्थानों पर प्लास्टिक के जमा होने की समस्या सामने आई थी. हरिद्वार में सूखे कचरे के बड़े हिस्से में प्लास्टिक की मौजूदगी दर्ज की गई थी. कचरे का सबसे खतरनाक हिस्सा वो है जो दिखाई ही नहीं देता. प्लास्टिक धीरे-धीरे टूटकर माइक्रोप्लास्टिक में बदल सकता है और पानी के साथ नदी तंत्र में पहुंच सकता है

उत्तराखंड की अलकनंदा नदी में मछलियों पर किए गए एक अध्ययन में माइक्रोप्लास्टिक मिलने की बात सामने आई थी. अध्ययन में अलग-अलग प्रजातियों में माइक्रोप्लास्टिक निगलने की मात्रा भी अलग पाई गई. इससे सफा अंदाजा लगाया जा सकता है कि कैसे पहाड़ से लेकर मैदान में ये कूड़ा हमारी नदियों के लिए जहर बन रहा है.

हिमालय और ग्लेशियर तक पहुंच रहा प्लास्टिक: उत्तराखंड के लिए सबसे गंभीर चिंता हिमालयी क्षेत्र की भी है. प्लास्टिक कचरा अगर ऊंचाई वाले क्षेत्रों में खुले में पड़ा रहता है तो उसका एक हिस्सा टूटकर छोटे कणों में बदल सकता है. इसी साल गोमुख जैसे स्थान पर भी भारतीय सेना और अन्य संस्थाओं ने सफाई अभियान चलाकर कई किलो कूड़ा नीचे उतारा था.

जंगलों में कूड़ा वन्यजीवों के लिए बन रहा खतरा: कचरे का असर सिर्फ इंसानों और नदियों तक सीमित नहीं है. जंगलों के आसपास जमा प्लास्टिक और भोजन का कचरा वन्यजीवों को भी मानव बस्तियों और कूड़ा स्थलों की ओर आकर्षित कर सकता है. हाल में वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान की टीम ने देहरादून के आशारोड़ी और मोहंड क्षेत्र में किए अध्ययन में पाया कि हाथियों के मल में पॉलिथीन थी. इसके अलावा, साल 2022 में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की टीम ने उत्तराखंड के कई वन प्रभाग से हाथियों और अन्य वन्यजीवों के नमूने लिए थे. उस दौरान जांच में 32 प्रतिशत नमूनों प्लास्टिक एल्युमिनियम के अवशेष और एक में कांच के अंश भी मिले थे. हालांकि, बाद में वन विभाग ने इस पर सख्ती तो बरती लेकिन उसका असर कितना हुआ, ये कहा नहीं जा सकता

सरकार के सामने अब सिर्फ सफाई नहीं, कचरा रोकने की चुनौती: उत्तराखंड सरकार ने 2026 में चारधाम यात्रा को प्लास्टिक मुक्त बनाने के लिए कई योजनाओं की घोषणा की थी. इनमें प्लास्टिक बोतलों को खत्म करने के लिए वाटर एटीएम और आरओ प्लांट, कचरा फैलाने वालों के खिलाफ कार्रवाई, प्लास्टिक वेस्ट के लिए मनी-बैक व्यवस्था और ड्रोन से कचरे की निगरानी जैसे उपाय शामिल कीए थे.

सीएम पुष्कर सिंह धामी की मानें तो सरकार और स्थानीय निकायों की ओर से लगातार सफाई कचरा संग्रहण सेग्रीगेशन रीसाइक्लिंग और प्लास्टिक नियंत्रण के प्रयास किए जा रहे हैं. सरकार ने 2026 की यात्रा को प्लास्टिक मुक्त बनाने के लिए निगरानी और तकनीकी व्यवस्थाओं को मजबूत किया है

चारधाम हमारी आस्था और संस्कृति के साथ-साथ हिमालय की संवेदनशील पारिस्थितिकी का भी हिस्सा है. हम चारधाम यात्रा को स्वच्छ, सुगम और पर्यावरण अनुकूल बनाने के लिए प्रतिबद्ध हैं. चारों धामों को प्लास्टिक मुक्त बनाने के लिए कचरे के वैज्ञानिक निस्तारण, प्लास्टिक कचरे के रिसाइकिल किए जाने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है. इस अभियान की सफलता के लिए सरकार के साथ, श्रद्धालुओं, स्थानीय लोगों और व्यापारियों की सहभागिता भी जरूरी है.

उत्तराखंड में बढ़ता पर्यटन जहां अर्थव्यवस्था को मजबूती दे रहा है वहीं उसके साथ कचरे का बढ़ता बोझ हिमालय, नदियों और जंगलों के लिए गंभीर चुनौती बन रहा है. अनियंत्रित पर्यटन और तीर्थाटन के कारण पहाड़ों और मैदानी धार्मिक स्थलों पर कचरे का पर्यावरणीय दबाव खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है. यह संकट सिर्फ इंसानों तक सीमित नहीं है बल्कि गोमुख ग्लेशियर और वन्यजीवों तक प्लास्टिक का पहुंचना पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक गंभीर संकट पैदा कर रहा है. अब जरूरत सिर्फ कूड़ा उठाने की नहीं बल्कि एक पर्यटक कितना कचरा छोड़ रहा है उसे कम करने और हर श्रद्धालु को कूड़ा वापस लाने की जिम्मेदारी समझाने की है, तभी भविष्य में पहाड़ और यहां की सुंदरता बच पाएगी.

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