हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि चेक पर हस्ताक्षर स्वीकार होने पर एनआइ एक्ट के तहत कानूनी धारणा लागू होती है, भले ही अन्य विवरण किसी और ने भरे हों। अल्मोड़ा के रमेश सिंह नगरकोटी की याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि खाली चेक पर हस्ताक्षर करने से कानूनी दायित्व समाप्त नहीं होता।
नैनीताल। हाई कोर्ट ने एक मामले में सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया है कि चेक में हस्ताक्षर की बात स्वीकार होने पर एनआइ एक्ट के तहत कानूनी धारणा लागू हो जाती है। कोर्ट ने कहा कि चेक के बाकी विवरण किसी अन्य व्यक्ति की ओर से भरे जाने या हस्ताक्षर और अन्य लिखावट में अंतर होने से यह धारणा समाप्त नहीं होगी।
न्यायाधीश न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की एकलपीठ ने अल्मोड़ा जिले के रमेश सिंह नगरकोटी की ओर से सत्र न्यायालय की ओर से अपील खारिज करने को चुनौती देती याचिका पर यह निर्णय दिया है।
ट्रायल कोर्ट ने याचिकाकर्ता को एक साल साधारण कारावास व 2.20 लाख अर्थदंड की सजा सुनाई थी। यह मामला दो लाख के बैंक चेक से संबंधित था। बैंक ने पर्याप्त धनराशि नहीं होने पर चेक लौटा दिया था।
कानूनी नोटिस के बाद भी चेक की राशि का भुगतान नहीं किया गया। याचिकाकर्ता का कहना था कि उसने खाली चेक पर केवल हस्ताक्षर कर कुलदीप बिष्ट को दिया था। बाद में उस चेक का दुरुपयोग किया गया।
चेक पर लिखावट उसके हस्ताक्षर से अलग है। कोर्ट ने पाया कि चेक पर हस्ताक्षर याचिकाकर्ता के होने की बात विवादित नहीं थी। चेक के बाकी विवरण किसी अन्य ने भरे थे, यह कानूनी दायित्व से मुक्त नहीं करता। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का हवाला देते हुए आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी।