
पशुओं और फसलों में एंटीबायोटिक व रसायनों के मनमाने उपयोग से इंसानों में एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (एएमआर) का खतरा बढ़ रहा है। इससे संक्रमण होने पर दवाएं बेअसर हो जाती हैं।
डेयरी और पोल्ट्री में हैवी एंटीबायोटिक का इस्तेमाल और खेतों में कीटनाशकों का अत्यधिक प्रयोग मानव स्वास्थ्य के लिए घातक है, क्योंकि ये उत्पाद दूध, अंडे, मांस और फसलों के माध्यम से शरीर में पहुँचते हैं। विशेषज्ञों ने नियंत्रण की सलाह दी है।
हल्द्वानी। इंसानों के शरीर में एएमआर का खतरे कम करने के लिए पशु-पक्षियों व फसलों में एंटीबायोटिक्स के प्रयोग का नियंत्रण बेहद जरूरी है। खेतों में कीटनाशक के तौर पर कुछ हार्मोन व एंटीबायोटिक्स युक्त रसायन या दवाओं का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल इंसानों के लिए घातक साबित हो सकती है।
अधिक मात्रा में एंटीबायोटिक युक्त उत्पाद खाने से इंसानों के शरीर में एंटी माइक्रोबियल रेजिस्टेंट (एएमआर) का खतरा बढ़ता है। जिससे बाद में कोई संक्रमण होने पर दवाएं असर नहीं करती। यही स्थिति पशुओं व पक्षियों में लागू होती है। कई डेयरी, पोल्ट्री कारोबारी अपनी गाय या मुर्गी को जल्दी ठीक करने के लिए हैवी एंटीबायोटिक देते हैं।
इससे उनका शरीर बैकटीरिया रेसिस्टेंट हो जाता है, जो बाद में किसी बीमारी के इलाज में बाधा बनता है। साथ ही यह पशुओं से मिले उत्पाद जैसे दूध, अंडा, मांस के जरिये मानव शरीर में पहुंचता है। इससे इंसानों में एएमआर का खतरा होता है। इस समस्या को लेकर दैनिक जागरण की टीम ने विशेष अभियान के तहत पड़ताल की है।
केस 1 :
हल्दूचौड़ स्थित पोल्ट्री फार्म में जागरण की टीम पहुंची, जहां उन्होंने मुर्गियों में इस्तेमाल होनी वाली दवाओं की जानकारी ली। जिस पर संचालक ने बताया कि मुर्गियों में कोई बीमारी होने पर पशुचिकित्सक को ही बुलाते हैं।
जिसमें कई बार पेट खराब होने पर सभी मुर्गियों को एक साथ पानी में घोल कर एक दवा पिलाते हैं। जहां सभी मुर्गियां एक साथ होती है। विशेषज्ञों ने बताया कि यदि यह डोज बिना सलाह के दी जाती है ,तो यह मुर्गियों को आराम देगी मगर इससे एएमआर की खतरा बढ़ सकता है।
केस 2 :
रामपुर रोड स्थित एक डेयरी में टीम ने वहां प्रयोग होनी वाली एंटीबायोटिक दवाओं व अन्य दवाओं की जानकारी ली। जहां पशुपालक ने यही बताया कि वह पशुचिकित्सक की सलाह पर दवाएं देते हैं। लेकिन कई बार डोज देने में गलती हो जाती है।
क्योंकि कुछ गाय दवा नहीं खाती। वहीं कुछ चारा में मिलाकर ज्यादा खा लेती है। पशु चिकित्सकों के अनुसार दवाओं की ओवर डोज या अंडर डोज की यह स्थिति पशुओं में एएमआर का खतरा बढ़ाती हैं।
केस 3 :
गौलापार पश्चिमी खेड़ा के एक किसान के खेत में जागरण टीम गई। कोहरे के कारण किसान कोई खाद नहीं डाल रहे थे, लेकिन किसान ने खुद बताया कि वह कुछ फसल की बढ़ावर के लिए यूरिया का इस्तेमाल करते हैं। साथ ही फसलों को कीटों से बचाने के लिए वह कीटनाशक का छिड़काव भी करते हैं।
ऐसे में कई बार उन्हें मात्रा का अंदाज नहीं आ पाता है। इस तरह एंटीबायोटिक या रसायानिक दवाएं फसलों में घुलती हैं। यही मानव शरीर में आहार के रूप में जाती है, जो शरीर की इम्युनिटी को कमजोर कर सकता है।
पशुचिकित्सक व कृषि विशेषज्ञ देते ज्यादा एंटीबायोटिक न लेने की सलाह
वरिष्ठ पशु चिकित्साधिकारी डा. आरके पाठक बताते है कि पशुओं को उनके वजन के हिसाब से दवाएं देनी होती है। उसी से उनकी डोज बनती है। इसलिए पशुओं में कोई भी बीमारी होने पर पशुचिकित्सक की सलाह अनुसार ही एंटीबायोटिक्स देनी है।
यदि कोई पशुपालक अपने मन से मेडिकल स्टोर से लाकर एंटीबायोटिक दवाएं पशु-पक्षियों को देता है, तो वह उनके शरीर में बैक्टिरियल रेजिस्टेंस कम कर देती है।जिससे बाद में कोई संक्रमण होने पर वह जल्दी ठीक नहीं हो पाते हैं।
डा. पाठक ने बताया कि गोवंशी, मुर्गियों या अन्य पशुओं को दवा देने का विड्राल टायम होता है, जो दवा के पैकैट में भी लिखा होता है। यानि इस समय अवधि तक पशु के शरीर में दवा का अंश रहता है। ऐसे में उक्त पशु का सेवन या उससे मिलने वाला उत्पाद खाने से मानव शरीर में एएमआर की स्थिति बना सकता है।
इधर, कृषि विशेषज्ञ नरेंद्र सिंह मेहरा ने बताया कि फसलों की बढ़ावर या कीटनाशक के तौर पर इस्तेमाल होने वाले रसायन मिट्टी व मानव के लिए हानिकारक है। ऐसे में यदि किसान प्राकृतिक खेती से जुड़े, तो वह इंसानों तक स्वस्थ आहार पहुंचा सकता है। वहीं मिट्टी का स्वास्थ्य भी बेहतर रहेगा।
खेतों में डलने वाले उर्वरक से उत्पादित फसल के सेवन से शरीर की इम्युनिटी कमजोर होती है। इसलिए किसानों को स्वस्थ आहार देने के लिए कम से कम रसायन का उपयोग करना है। कृषि अधिकारियों की सलाह अनुसार ही उर्वरक की मात्रा रखनी है। किसानों को मात्रा से ज्यादा गुणवत्ता का विशेष ध्यान रखना है। – रितु टम्टा, मुख्य कृषि अधिकारी, नैनीताल
पशुओं को जल्दी ठीक करने में हैवी एंटीबायोटिक्स बीमारी तुरंत ठीक करती है, लेकिन यह बाद में गंभीर स्वास्थ्य संकट बनता है। इससे पशुओं में बैक्टिरीयल रेजिस्टेंट होने से बाद में कोई संक्रमण का इलाज नहीं हो पाता है। इसका पशुपालकों को ध्यान देना है। – डा. रमेश नितवाल, अपर निदेशक, कुमाऊं









