
उत्तराखंड शिक्षा विभाग ने प्रारंभिक कक्षाओं की वार्षिक परीक्षाएं दो चरणों में कराने का निर्णय लिया है। कक्षा 6-8 की फरवरी में और 1-5 की मार्च में होंगी। विभाग इसे सुचारू व्यवस्था और भीड़ कम करने के लिए बता रहा है,
लेकिन शिक्षक संगठन इसका विरोध कर रहे हैं। शिक्षकों का कहना है कि इससे कार्यभार बढ़ेगा और छात्रों की पढ़ाई प्रभावित होगी। वे सभी कक्षाओं की परीक्षाएं एक साथ मार्च में कराने की मांग कर रहे हैं।
देहरादून। शिक्षा विभाग ने इस वर्ष प्रारंभिक कक्षाओं की वार्षिक परीक्षाएं दो चरणों में आयोजित करने का निर्णय लिया है, जिस पर शिक्षकों के बीच नाराजगी देखने को मिल रही है।
विभाग के अनुसार परीक्षा व्यवस्था सुचारू रखने और समय प्रबंधन बेहतर बनाने के उद्देश्य से कक्षा छह से आठवीं तक की परीक्षाएं 12 से 18 फरवरी के बीच आयोजित की जाएंगी। वहीं कक्षा पहली से पांचवीं तक की परीक्षाएं बोर्ड परीक्षाओं के बाद 17 मार्च से 24 मार्च तक प्रस्तावित हैं।
विभाग का तर्क है कि चरणबद्ध परीक्षा से विद्यालयों में भीड़ कम होगी और मूल्यांकन कार्य समय पर पूरा किया जा सकेगा। हालांकि शिक्षक संगठनों ने इस निर्णय को अव्यावहारिक और छात्र हित के विपरीत बताते हुए विरोध शुरू कर दिया है। उनका कहना है कि दो चरणों में परीक्षा कराने से शिक्षकों पर अतिरिक्त कार्यभार बढ़ेगा और नियमित शैक्षणिक गतिविधियां प्रभावित होंगी।
उधर, प्रारंभिक शिक्षा निदेशक अजय कुमार नौडियाल ने कहा कि परीक्षा समय तय करना एससीईआरटी का काम है। परीक्षा के आयोजन को लेकर किसी भी शिक्षक को दिक्कत नहीं होनी चाहिए, परीक्षा चाहे आगे हो या बाद में।
उधर, उत्तराखंड राज्य प्राथमिक शिक्षक संघ की प्रांतीय तदर्थ समिति सदस्य मनोज तिवारी का कहना है कि अलग-अलग परीक्षा कार्यक्रम जारी होने से प्रदेश के शिक्षकों में ऊहापोह है। निदेशक माध्यमिक शिक्षा, निदेशक प्रारंभिक शिक्षा और निदेशक एससीईआरटी को पत्र भेजकर परीक्षा तिथियों में बदलाव की मांग की गई है।
तर्क है कि जब प्राथमिक स्तर की परीक्षाएं मार्च में होनी हैं तो जूनियर स्तर की परीक्षाएं फरवरी में कराने से छात्रों की पढ़ाई प्रभावित होगी। जिला प्राथमिक शिक्षक संघ के अध्यक्ष धर्मेंद्र रावत ने ने मांग की है कि कक्षा एक से आठवीं तक की परीक्षाएं 17 मार्च से एक साथ आयोजित की जाएं, ताकि छात्रों और शिक्षकों दोनों को सुविधा मिल सके।









