
देहरादून में अनियोजित खोदाई के कारण सड़कें जानलेवा बन गई हैं। सीवर, पेयजल व विद्युत लाइनों के लिए हो रही अंधाधुंध खोदाई से शहर में गड्ढों का जाल बिछ गया है, जिससे दुर्घटनाएं बढ़ रही हैं। प्रशासन की अनदेखी और निर्माण एजेंसियों की मनमानी से जनता की जान जोखिम में है, जबकि डीएम के आदेश भी बेअसर साबित हो रहे हैं। यह अव्यवस्था शहरवासियों के लिए बड़ी समस्या बन गई है।
दून में ‘खोदाई का आतंक’, जानलेवा संकट बनी सड़कें, किस्मत के सहारे चल रहे शहरवासी
-निर्माण एजेंसियों की मनमानी चरम पर, शहर की सड़कें हुईं बर्बाद, डीएम के आदेश भी बेअसर
अंकुर अग्रवाल, देहरादून। दून शहर में अब गड्ढे सड़क पर नहीं, सड़कें गड्ढों में बदल चुकी हैं। शहर में खोदाई का यह अराजक तंत्र अब शहर की रफ्तार ही नहीं रोक रहा, बल्कि सीधे-सीधे जनता की जान से खेल रहा है।
पूरा शहर खोदाई का शिकार बना पड़ा है, जनता सड़क के सहारे नहीं बल्कि किस्मत के सहारे चल रही है। इस समय ऐसा कोई इलाका नहीं बचा जो खोदाई की मार से अछूता हो।
पूरे शहर में सीवर, पेयजल व भूमिगत विद्ययुत लाइन समेत विभिन्न परियोजनाओं की अनियोजित और अंधाधुंध खोदाई से सड़कें जानलेवा बन चुकी हैं। सवाल यह उठ रहा है कि आखिर कब तक शहर की जनता इस ””आपदा”” जैसी अव्यवस्था का शिकार होती रहेगी। खोदाई के कार्यों में मनमानी कर रहीं एजेंसियों पर डीएम की कार्रवाई व चेतावनियों का भी कोई असर नहीं दिख रहा है।
दिल्ली में दो दिन पहले ही गड्ढ़े में गिरने से उत्तराखंड के पौड़ी निवासी युवक की मृत्यु हो गई थी। इससे कुछ दिन पहले नोएडा में इसी तरह एक इंजीनियर की भी मृत्यु हुई थी। अब उसी तर्ज पर देहरादून शहर भी खोदाई के खतरे का शहर बनता जा रहा है।
सरस्वतीपुरम मियांवाला में बुजुर्ग के सीवर लाइन के लिए खोदे गए गड्ढे में गिरने से बुरी तरह घायन होने की घटना ने साफ कर दिया है कि जगह-जगह सड़कों के चीरफाड़ ने किस तरह शहरवासियों की जान जोखिम में डाली हुई है, मगर निर्माण एजेंसियों की मनमानी पर न तो प्रशासन की सख्ती असर दिखा पा रही है और न ही जिम्मेदारी का कोई भाव नजर आ रहा है।
सरस्वतीपुरम में में हुई घटना के बाद केवल बुजुर्ग कमलनयन का परिवार ही नहीं बल्कि क्षेत्र के लोग भी सदमे में हैं और प्रशासनिक लापरवाही पर उनमें उबाल नजर आ रहा है। यह हाल सिर्फ एक अकेले सरस्वतीपुरम का नहीं है, बल्कि पूरे शहर का है। दून की सड़कों पर फैल रही यह अव्यवस्था किसी प्राकृतिक आपदा का परिणाम नहीं, बल्कि प्रशासन और निर्माण एजेंसियों की अनदेखी का सीधा नतीजा है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि यह लापरवाही नहीं, बल्कि जिम्मेदार एजेंसियों का गंभीर श्रेणी का अपराध है।
अराजक हुई एजेंसियां, पीड़ा झेल रहे लोग
कहीं बैरिकेडिंग नहीं, कहीं चेतावनी बोर्ड गायब, और कई जगह गड्ढों के चारों ओर रोशनी तक नहीं, जैसे दुर्घटना का इंतजार हो। हालात यह हैं कि जिस सड़क को देखिए, वह कटी-फटी, उखड़ी और धंसी हुई दिखाई देती है। बारिश के मौसम तक स्थिति और भयावह होने का अंदेशा है।
शहरवासियों का कहना है कि खतरनाक गड्ढों का यह फैलता जाल किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है। लोगों की सुरक्षा से खिलवाड़ करने वाली एजेंसियों पर कठोर कार्रवाई और खोदाई कार्यों की सख्त मानिटरिंग की मांग तेज हो रही है।
इंटरनेट मीडिया पर छलक रहा शहर का दर्द
दून की बदहाल सड़कों को लेकर अब इंटरनेट मीडिया पर भी सरकारी सिस्टम की जमकर आलोचना हो रही है। एक यूजर ने लिखा है कि ””सड़कें अब कब्रगाह बन चुकी हैं। सुबह घर से निकलते हैं तो यकीन नहीं होता कि लौट भी पाएंगे या नहीं।”” वहीं, एक ने लिखा कि ””ट्रैफिक जाम, धूल, कीचड़, पानी भरे गड्ढे… यह राजधानी है या किसी बदहाल कस्बे की तस्वीर?””
एक यूजर ने लिखा है कि अभी एक बुजुर्ग बुरी तरह घायल हुआ है, कल कौन होगा यह भी देखिए सरकार? कमलनयन उनियाल की यह दुर्घटना सिर्फ शुरुआत है। यदि यही हाल रहा तो दून को जल्द गंभीर हादसों की श्रृंखला झेलनी पड़ेगी। …लेकिन निर्माण एजेंसियां हर बार की तरह जिम्मेदारी से बच निकलेंगी और पीड़ा भुगतेगी जनता। दून विकास नहीं, ‘खोदाई का शिकार’ हो रहा।
कर्जन रोड पर दिनदहाड़े नियमों की धज्जियां
डालनवाला का कर्जन रोड इन दिनों प्रशासन की नाकामी और निर्माण एजेंसियों की मनमानी का सबसे बड़ा उदाहरण बन चुका है। स्कूल समय में खोदाई पर स्पष्ट प्रतिबंध होने के बावजूद दिनदहाड़े भूमिगत विद्युत लाइन बिछाने का काम जारी है। सड़क एक तरफ से पूरी तरह खोद दी गई है और दूसरी तरफ वाहनों का रेला घंटों जाम में फंसा रहता है। यहां कई प्रतिष्ठित निजी स्कूल हैं और इसी मार्ग से जिला अस्पताल कोरोनेशन के मरीज भी गुजरते हैं। …लेकिन हालात ऐसे कि न छात्रों की सुरक्षा की चिंता निर्माण एजेंसी को है, न अभिभावकों व मरीजों की परेशानी का ख्याल।
स्कूलों की छुट्टी के समय तो हालात बेकाबू हो जाते हैं, बच्चे घंटों जाम में फंसे रहते हैं। एंबुलेंस तक जाम में दम तोड़ती दिखाई देती है। सड़क पर जगह-जगह गहरे गड्ढे दुर्घटना को न्योता दे रहे हैं। फिसलन, धूल और उबड़-खाबड़ सड़क ने पैदल चलना भी मुश्किल कर दिया है।
प्रशासन का आदेश है कि सुबह छह बजे से रात 10 बजे तक कोई खोदाई नहीं होगी, लेकिन कर्जन रोड पर यह प्रतिबंध मजाक बन गया है। न कोई मानिटरिंग, न कोई जवाबदेही। निर्माण एजेंसी खुलेआम नियमों को कुचल रही है और प्रशासन मूकदर्शक बना हुआ है।
सुलगते सवाल व शहर के हाल
- कहां है वह समयबद्ध कार्ययोजना?
- कहां है वह मानिटरिंग, जिसके दावे बार-बार किए जाते हैं?
- सड़कें खोद दी जाती हैं, फिर हफ्तों तक भरी नहीं जातीं।
- एक एजेंसी खोदती है, दूसरी फिर से वहीं खोद डालती है।
- दोपहिया वाहन चालक हर पल गिरने के डर में जी रहे हैं।
- रात में चलने का मतलब खुद को जोखिम में डालना है।
- निर्माण एजेंसियों पर कोई लगाम नहीं, हवा में डीएम के आदेश।
- यह तालमेल नहीं, अराजकता का नंगा नाच है।
- जनता चीख रही, सरकारी तंत्र नहीं सुन रहा।









