
हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट करने के लिए कहा है कि इन अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति की मांग केंद्र सरकार ने की थी या राज्य सरकार ने स्वयं यह पहल की।
आईजी स्तर के वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी अरुण मोहन और नीरू गर्ग को केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर डीआईजी पद पर जबरन भेजने के मामले में हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने राज्य और केंद्र सरकार से एक दिन में शपथपत्र देने के लिए कहा है।
हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट करने के लिए कहा है कि इन अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति की मांग केंद्र सरकार ने की थी या राज्य सरकार ने स्वयं यह पहल की। कोर्ट ने एक दिन में राज्य व केंद्र सरकार से जवाब और उसके एक दिन के भीतर याचिकाकर्ताओं को प्रतिशपथपत्र देने के निर्देश दिए हैं। मामले की सुनवाई बृहस्पतिवार को होगी।
मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। उत्तराखंड के वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों को बगैर उनके आवेदन के और अनिच्छा जाहिर किए जाने के बावजूद वर्तमान से नीचे के पद पर केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर भेजे जाने के खिलाफ हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी।
आईजी स्तर की अधिकारी नीरू गर्ग को भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) में डीआईजी पद पर जबकि आईजी अरुण मोहन जोशी को सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) में डीआईजी के पद पर तैनात किया गया था।
अधिकारियों ने कहा था कि उन्होंने केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के लिए आवेदन नहीं किया था। वे आईजी के पद पर हैं और उन्हें जबरन नीचे के डीआईजी पद पर भेजा जा रहा है।
यह भी कहा कि हाल ही में उन्हें केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के लिए पांच वर्ष के लिए डिबार करते हुए इस पर रोक भी लगाई जा चुकी थी। इसके बावजूद राज्य सरकार ने ही पहल करते हुए 16 फरवरी 2026 को इनके नाम गृह मंत्रालय को भेज दिए और केंद्र ने प्रतिनियुक्ति पर उनकी तैनाती तय कर दी।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने कहा कि यदि अधिकारियों को इस निर्णय पर आपत्ति थी तो उन्हें केंद्रीय प्रशासनिक अभिकरण (कैट) में जाना चाहिए था। याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि डेपुटेशन पर भेजने का प्रस्ताव राज्य सरकार का ही है, इसलिए सुनवाई हाईकोर्ट में की जानी चाहिए। सुनवाई के बाद खंडपीठ ने मामले में सरकार से जवाब मांगा था।








