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Big Breaking:-डरावनी चीख वाला ‘जंगल का भूत’ फिर नजर आया, कॉर्बेट नेशनल पार्क में कैमरे में कैद हुआ दुर्लभ उल्लू

कार्बेट पार्क से सटे रामनगर वन प्रभाग में दुर्लभ स्पाट बेलीड ईगल आउल फिर दिखा है। वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर दीप रजवार ने इसकी तस्वीर खींची। यह उल्लू अपनी डरावनी आवाज के कारण ‘जंगल का भूत’ कहलाता है।

पांच साल बाद नजर आया यह निशाचर पक्षी भारत के घने वनों में पाया जाता है। ध्वनि प्रदूषण इसके शिकार और प्रजनन चक्र को प्रभावित कर रहा है।

रामनगर (नैनीताल)। कार्बेट पार्क से सटे रामनगर वन प्रभाग के सीतावनी व रिगोंड़ा क्षेत्र में दुर्लभ स्पाट बेलीड ईगल आउल की मौजूदगी मिली है। पहली बार यह वर्ष 2020 में कार्बेट के ढिकाला व सीतावनी पर्यटन जोन तो इस बार यह रिगोंड़ा खत्ते के जंगल में नजर आया है। वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर दीप रजवार ने इसकी तस्वीर कैमरे में कैद की है।

कार्बेट पार्क व उसके आसपास बाहरी वन क्षेत्रों में 18 से अधिक आउल की प्रजाति है, लेकिन बेलीड ईगल आउल जंगलों में बहुत कम ही नजर आता है। वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर दीप रजवार के मुताबिक इस बार भी यह पांच साल बाद नजर आया है।

डरावनी आवाज की वजह से इसे ‘जंगल का भूत’ भी कहा जाता है। क्योंकि रात में इसकी आवाज डर का अहसास कराती है। यह जब चीखता है तो इसकी आवाज रात के सन्नाटे को तोड़ देती है। जिसे स्थानीय लोग अक्सर भूतिया घटना भी मान लेते हैं। यह पक्षी भारत के घने वनों और दक्षिणी पूर्व एशिया में पाया जाता है।

रजवार बताते हैं कि यह उल्लू इंसानों की तरह चीखने जैसी आवाज निकालता है। जिसे सुनकर अक्सर लोग डर जाते हैं। यह निशाचर पक्षी है। जो रात में सक्रिय रहता है। यह घने जंगलों में ऊंचे पेड़ पर रहता है। इसका आकार भी अन्य उल्लु प्रजाति से बड़ा होता है। रात में इसकी आंखें चमकती है।

कार्बेट व उसके आसपास के वन क्षेत्रों में ब्राउन फिश आउल, टॉनी फिश आउल, ओरिएंटल स्काप्स आउल, स्काप्स आउल , स्पाट-बेलीड ईगल आउल, एशियन बार्ड आउलेट, स्पॉटेड आउलेट, ब्राउन हॉक आउल प्रजाति सामान्य तौर पर

दिख जाती है। उल्लु प्रजाति रात में आंखों के साथ ही खासकर सुनने की क्षमता के आधार पर शिकार करता है। जंगल में हल्की सी आहट को भी यह सुन लेता है।

वन्य जीव विशेषज्ञ बताते हैं कि उल्लु प्रजाति सुनने की क्षमता के आधार पर रात में शिकार करते हैं। लेकिन जिस तेजी से ध्वनि प्रदूषण बढ़ रहा है। इससे इनका पलायन हो रहा है। इनके शिकार करने की क्षमता प्रभावित हो रही है।

प्रजनन चक्र भी बाधित हुआ है। जिस तरह कुछ उल्लु प्रजाति कोसी नदी के समीप आसानी से दिख जाते थे, लेकिन अब यह नदी की ओर कम नजर आते हैं।

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