
केंद्रीय बजट में उत्तराखंड के लिए माउंटेन ट्रेल की घोषणा से स्वामी विवेकानंद से जुड़े प्राचीन पैदल मार्गों के पुनरुद्धार की उम्मीद जगी है। इससे कत्यूरकालीन काकड़ीघाट,
स्याहीदेवी और कैलाश मानसरोवर जैसे धार्मिक व साहसिक पर्यटन स्थलों को बढ़ावा मिलेगा। यह पहल प्रकृति संरक्षण, युवाओं में जागरूकता और पर्यटन को नई दिशा देगी, जिससे अतीत का गौरव लौटेगा।
रानीखेत। केंद्रीय बजट में देवभूमि उत्तराखंड के लिए माउंटेन ट्रेल की घोषणा से प्राचीन धार्मिक व व्यापारिक पैदल मार्गों के दोबारा अस्तित्व में आने की उम्मीद जगी है। खासतौर पर हिमलायी पदयात्रा पर देवभूमि पहुंचे युग पुरुष स्वामी विवेकानंद की स्मृतियों से जुड़े वह पैदल पथ एक बार पुन: आबाद हो सकेंगे, जिन रास्तों से होकर एकात्म मानववाद के प्रणेता अपने गुरुभाई अखंडानंद के साथ गुजरे थे।
इनमें युगनायक की तपस्थली रहे कत्यूरकालीन काकड़ीघाट तथा अल्मोड़ा से कोसी घाटी पार कर रौनडाल होकर आध्यात्मिक पर्यटन स्थल स्याहीदेवी तक ट्रेल के दिन बहुरने की आस जगी है। इसके अलावा जागेश्वर धाम से कैलास मानसरोवर तक के प्राचीन पथ को भी धार्मिक पर्यटन के लिए विकसित किया जा सकेगा।
वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने नवें केंद्रीय बजट में उत्तराखंड को माउंटेन ट्रेल के रूप में जो ताेहफा दिया है, उससे धार्मिक व साहसिक पर्यटन में दिलचस्पी व ऐतिहासिक विषयों के प्रति रुचि रखने वालों ने इसे सराहनीय कदम बताया है।
स्वामी विवेकानंद के यात्रा मार्गों की खोज कर युवाओं को रू ब रू कराने में जुटे पर्वतारोही व साहसिक पर्यटन से जुड़े राक लिजार्ड ग्रुप के विनोद भट्ट ने कहा कि नैनीताल से अल्मोड़ा तक के पैदल पथ को शानदार ट्रेल के रूप में विकसित किया जा सकता है।
क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी (कुमाऊं) चंद्र सिंह चौहान के अनुसार स्वामी विवेकानंद की यात्रा के साथ ही प्राचीन तीर्थाटन मार्गों की भी कायाकल्प की दिशा में तेजी से कार्य होंगे।
लौटेगा स्याहीदेवी पैदल ट्रैक का प्राचीन गौरव
स्वामी विवेकानंद 1890 में हिमालयी पदयात्रा के दौरान काठगोदाम से नैनीताल, भवाली, रातीघाट, रामगाढ़, गरमपानी होकर काकड़ीघाट पहुंचे थे। यहां कोसी व सिरौता नदी के संगम पर कत्यूरकालीन कर्कटेश्वर महादेव मंदिर परिसर में वर्षों पुराने पीपल वृक्ष की छांव में उन्होंने सूक्ष्म ब्रह्मांड का ज्ञान प्राप्त किया था।
यहां विवेकानंद शिला भी मौजूद है। यहां से स्वामी विवेकानंद क्वारब, होकर लोधिया, करबला होकर अल्मोड़ा पहुंचे थे। अल्मोड़ा में ब्राइट एंड कार्नर से उतर खत्याड़ी (वर्तमान बेस चिकित्सालय), सैनार फिर कोसी नदी पार कर सामने धामस क्षेत्र मेंं राैनडाल का भीष
ण जंगल की चढ़ाई चढ़ युगपुरुष स्याहीदेवी की पहड़ी की चोटी पर पहुंचे थे, जहां शक्ति की प्रतीक मां स्याहीदेवी के कत्यूरकालीन मंदिर में 25 से 28 मई 1998 तक ठहरे। रोज वह दस घंटे ध्यानमग्न रहते थे।
साकार होगी विवेकानंद कारिडोर की सोच
भाजपा प्रदेश मंत्री महिला मोर्चा एवं शिक्षिका बिमला रावत ने कहा कि युवाओं के प्रेरणास्रोत स्वामी विवेकानंद की यादों से जुड़े यात्रा मार्गों को विवेकानंद कारिडोर के रूप में विकसित करने को धामी सरकार कार्ययोजना बना भी रही है। काकड़ीघाट, स्याहीदेवी के साथ ही श्यामलाताल (चंपावत) भी विवेकानंद यात्रा मार्ग का अहम पड़ाव रहा है। चूंकि ये ऐतिहासिक मार्ग वन क्षेत्रों से होकर गुजरते हैं, लिहाजा वित्त मंत्री की यह सौगात इन ऐतिहासिक पथों को संजोकर प्रकृति व पर्यावरण संरक्षण, वनों के प्रति प्रेम व जागरूकता पैदा कर साहसिक पर्यटन को बढ़ावा देने में मील का पत्थर साबित होगा।
इन तीर्थ यात्रा मार्गोँ के संवरने की आस
पुरातत्वविद् चंद्र सिंह चौहान कहते हैं कि माउंटेन ट्रेल की घोषणा से मुख्य कैलास व आदि कैलास के साथ ही छोटा कैलास (नैनीताल), पार्वती ताल, पंचाचुली, नंदाखाट, पिंडारी यात्रा पथ को पुरानी पहचान मिल सकेगी। जागेश्वर से गंगोलीहाट, थल, डीडीहाट, अस्कोट, धारचूला, दारमा, चौदास व व्यास घाटी होकर कैलास मानसरोवर तक का यात्रा मार्ग साहसिक पर्यटन के रूप में विकसित हो सकेगा।








