उत्तराखंड के हिमालयी वनों में 140 साल बाद एक दुर्लभ औषधीय पौधा ‘स्वर्टिया डाइलेटाटा वैराइटी पिलोसा’ फिर से खोजा गया है।
देहरादून। उत्तराखंड के हिमालयी वनों से एक ऐसी खोज सामने आई है, जिसने वनस्पति विज्ञानी जगत को उत्साहित कर दिया है। करीब 140 वर्ष पहले दर्ज किए गए एक दुर्लभ औषधीय पौधे को दोबारा खोज निकाला है।
यह पौधा स्वर्टिया डाइलेटाटा वैराइटी पिलोसा है, जिसे वर्ष 1883 के बाद कभी नहीं देखा गया। चमोली जिले के बदरीनाथ वन प्रभाग के देवाल क्षेत्र में इसकी मौजूदगी दर्ज की गई। इस महत्वपूर्ण खोज को अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका ओरिक्स में प्रकाशित किया गया है।
अध्ययन में भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण के उत्तरी क्षेत्रीय केंद्र, देहरादून के विज्ञानी अंबर श्रीवास्तव और डा. सुशील कुमार सिंह के साथ हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विवि के विज्ञानी डा. सुनीत सिंह और प्रो. जेपी मेहता शामिल रहे।
विज्ञानियों के अनुसार स्वर्टिया वंश के पौधों को सामान्य बोलचाल में चिरायता कहा जाता है। आयुर्वेद और पारंपरिक चिकित्सा पद्धति में इनका उपयोग बुखार, पाचन संबंधी समस्याओं, यकृत (लीवर) के रोगों तथा मधुमेह जैसी बीमारियों में किया जाता रहा है।
औषधीय मांग अधिक होने के कारण इस समूह की कई प्रजातियां वर्षों से अत्यधिक दोहन का शिकार हैं। यही कारण है कि इनमें से कई अब संकटग्रस्त श्रेणी में पहुंच चुकी हैं।
इस पौधे का पहला विज्ञानी विवरण वर्ष 1883 में नेपाल से प्राप्त नमूनों के आधार पर तैयार किया गया था।
इसके बाद लगभग डेढ़ शताब्दी तक दुनिया में कहीं भी इसकी पुष्टि नहीं हो सकी। विज्ञानी इसे लगभग विलुप्त मानने लगे थे।
हालांकि, जब शोध दल चमोली जिले के पूर्वी पिंडर क्षेत्र में वनस्पति सर्वेक्षण कर रहा था, तब देवाल क्षेत्र के सदाबहार जंगलों में इस पौधे के कुछ ही नमूने मिले। यह भारत में इस किस्म का पहला प्रमाणित अभिलेख भी माना जा रहा है।
इसलिए महत्वपूर्ण है खोज
कई बार कोई पौधा दशकों तक दिखाई नहीं देता। इसका अर्थ यह नहीं होता कि वह पूरी तरह समाप्त हो गया है।
कई दुर्लभ प्रजातियां केवल सीमित क्षेत्र, विशेष ऊंचाई, अनुकूल तापमान और खास प्रकार की मिट्टी में ही उगती हैं।
यदि लंबे समय तक उनका सर्वेक्षण न हो तो वे विज्ञानी अभिलेखों से गायब हो जाती हैं। ऐसे पौधे के दोबारा मिलने को पुनर्खोज कहा जाता है।
यह जैव विविधता संरक्षण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इससे उस प्रजाति को बचाने की नई उम्मीद पैदा होती है।
कुछ ही पौधे मिले, इसलिए चिंता भी बढ़ी
शोधकर्ताओं ने बताया कि उन्हें इस प्रजाति के बहुत कम पौधे मिले। ये सदाबहार वनों के अर्ध-छायादार स्थानों में उग रहे थे।
इतनी कम संख्या मिलने के कारण विज्ञानी अभी इसकी आबादी, विस्तार और वास्तविक स्थिति का विस्तृत आकलन कर रहे हैं।
इसके आधार पर भविष्य में इसे प्रकृति संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय संघ (आइयूसीएन) की संकटग्रस्त प्रजातियों की सूची में उपयुक्त श्रेणी में शामिल किया जा रहा है।
जलवायु परिवर्तन और मानवीय दबाव भी बन रहे खतरा
वनस्पति विज्ञानियों का कहना है कि हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ता तापमान, बदलता वर्षा चक्र, सड़क निर्माण, अनियंत्रित पर्यटन और औषधीय पौधों का अत्यधिक संग्रहण दुर्लभ वनस्पतियों के अस्तित्व के लिए बड़ी चुनौती बन रहे हैं।
यदि इनके प्राकृतिक आवास नष्ट होते रहे तो कई ऐसी प्रजातियां हमेशा के लिए समाप्त हो सकती हैं। इसलिए समय रहते इनके संरक्षण और नियमित विज्ञानी निगरानी की आवश्यकता है।