
अखिल विश्व गायत्री परिवार शांतिकुंज हरिद्वार तीन दशकों से गंगा व अन्य नदियों की स्वच्छता के लिए ‘जल शुद्धि’ अभियान चला रहा है। हजारों स्वयंसेवक घाटों की सफाई, प्लास्टिक उन्मूलन और जल संरक्षण हेतु श्रमदान करते हैं।
यह अभियान आस्था और सामाजिक उत्तरदायित्व का संगम है, जो अब देश की कई नदियों तक फैल चुका है। इसमें स्वच्छता, पवित्रता और पीने योग्य जल के तीन चरण शामिल हैं, जिसे यूनेस्को की सराहना भी मिली है।
हरिद्वार। गंगा सदियों से जीवन, आस्था और विश्वास की सजीव धारा रही है, लेकिन उसके अविरल प्रवाह में सबसे बड़ी चुनौती स्वच्छता और निर्मलता की है। इसी से पार पाने के लिए अखिल विश्व गायत्री परिवार शांतिकुंज बीते तीन दशक से ‘जल शुद्धि’ अभियान में जुटा है।

इसके तहत हजारों स्वयंसेवक घाटों की सफाई, प्लास्टिक उन्मूलन और जल संरक्षण के लिए श्रमदान करते हैं। इसलिए यह अभियान आस्था और सामाजिक उत्तरदायित्व का अनूठा संगम बन चुका है। गंगा तट से शुरू हुई यह पहल अब देश की तमाम नदियों तक विस्तार पा चुकी है।

देश में गंगा व अन्य नदियों में स्वच्छता की स्थिति चिंताजनक है। यहां तक कि गांव-देहात में जलाशयों की स्थिति भी अच्छी नहीं है। इन्हीं नदी और जलाशयों की स्वच्छता के लिए अखिल विश्व गायत्री परिवार की विभिन्न शाखाएं अपने-अपने क्षेत्र में संगठित रूप से कार्य कर रही हैं। उत्तराखंड में गंगा की स्वच्छता के लिए शांतिकुंज हरिद्वार की ओर से स्वच्छोत्सव के तहत स्वच्छता सेवा पखवाड़ा आयोजित किया जाता है।
नेपाल से निकलने वाली बागमती नदी में शांतिकुंज की ओर से चलाए गए वृहद स्वच्छता अभियान को वर्ष 2012-13 में यूनेस्को की सराहना मिल चुकी है। इसी प्रकार उत्तर प्रदेश में गोमती, राजस्थान में बनास, मध्य प्रदेश में ताप्ती, छत्तीसगढ़ में शिवनाथ नदी की स्वच्छता के लिए चरणबद्ध अभियान संचालित किए जा रहे हैं।
इनके तहत प्लास्टिक कचरा, गंगा में प्रवाहित पूजा सामग्री और अन्य अपशिष्टों को पूरी तरह से हटाने तक सतत श्रमदान किया जाता है। प्रत्येक नदी के लिए यह अभियान तीन से चार वर्षों तक योजनाबद्ध रूप में चलता है।
शुरुआती चरण में प्रतिदिन सफाई, फिर साप्ताहिक और फिर मासिक स्वरूप में इसे निरंतरता दी जाती है। राजस्थान में बनास नदी के लिए दो वर्ष तक विशेष अभियान संचालित किया गया। अखिल विश्व गायत्री परिवार के युवा प्रतिनिधि डा. चिन्मय पंड्या कहते हैं कि जल शुद्धि अभियान तीन चरणों में संचालित होता है, जिसमें ‘स्वच्छता’, ‘पवित्रता’ व ‘पीने योग्य जल’ शामिल है।
पहले चरण में कूड़ा-करकट और प्लास्टिक हटाकर तटों को स्वच्छ किया जाता है। दूसरे चरण में सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक जागरण के माध्यम से नदियों के प्रति सम्मान एवं संरक्षण का भाव विकसित किया जाता है। तीसरे चरण में जल को पीने योग्य बनाने के लिए जनजागरूकता अभियान चलाया जाता है।
प्रत्येक वर्ष स्वच्छोत्सव
‘स्वच्छोत्सव’ के अंतर्गत प्रत्येक वर्ष अक्टूबर-नवंबर में स्वच्छता सेवा पखवाड़े आयोजित होता है। इस दौरान हरिद्वार में गंगा तट के पांच किमी क्षेत्र को कूड़ामुक्त किया जाता है। सप्तऋषि घाट से हरकी पैड़ी व बैरागी द्वीप तक सैकड़ों स्वयंसेवक 10 से अधिक दलों में विभाजित होकर प्रतिदिन तीन घंटे श्रमदान करते हैं। इस दौरान हजारों टन प्लास्टिक सहित जैविक-अजैविक कूड़ा गंगा तट से हटाया जाता है।









