उत्तराखंड का 2016 वीपीडीओ परीक्षा घोटाला एक दशक बाद फिर सुर्खियों में है, जिसमें पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के पूर्व ओएसडी चंदन सिंह जीना के ठिकानों पर ईडी ने दस्तक दी है।
देहरादून। उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (यूकेएसएसएससी) की ग्राम पंचायत विकास अधिकारी (वीपीडीओ) परीक्षा-2016 का घोटाला करीब एक दशक बाद फिर सुर्खियों में है। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के पूर्व ओएसडी चंदन सिंह जीना के ठिकानों पर ईडी की दस्तक ने पूरे प्रकरण की संवेदनशीलता को एक बार फिर उजागर कर दिया है।
प्रकरण के आलोक में जाकर देखें तो इस कार्रवाई तक पहुंचने की कहानी वर्ष 2016 में परीक्षा परिणाम जारी होने के तुरंत बाद उठी शिकायतों से शुरू होती है।
यूकेएसएसएससी ने 6 मार्च 2016 को 236 केंद्रों पर वीपीडीओ के 196 पदों के लिए परीक्षा कराई थी। परीक्षा में 87,196 अभ्यर्थी शामिल हुए। परिणाम 30 मार्च 2016 को घोषित किया गया और 196 अभ्यर्थियों के चयन की घोषणा हुई। परिणाम आते ही परीक्षा की निष्पक्षता पर सवाल उठने लगे। अभ्यर्थियों की ओर से शिकायतें सामने आईं और चयन प्रक्रिया पर संदेह गहराता गया।
शिकायतों में चयन के पैटर्न को लेकर भी सवाल उठे। बाद की जांच में यह तथ्य सामने आया कि एक ही गांव से बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों का चयन हुआ था। दो सगे भाइयों के भी चयनित होने और उनके अंकों को लेकर सवाल उठे।
2017 में जांच कमेटी बनी, परीक्षा का परिणाम निरस्त
शिकायतों को देखते हुए वर्ष 2017 में तत्कालीन अपर मुख्य सचिव की अध्यक्षता में जांच समिति गठित की गई। जांच में परीक्षा में अनियमितताओं की पुष्टि हुई। समिति की रिपोर्ट और बाद में न्यायालय के निर्देशों के आधार पर 2016 की परीक्षा का परिणाम निरस्त कर दिया गया।
इसके बाद दोबारा परीक्षा कराई गई। उपलब्ध रिकार्ड के अनुसार दोबारा हुई परीक्षा में पहले चयनित 196 अभ्यर्थियों में से केवल आठ ही दोबारा चयनित हो पाए। इससे पहली परीक्षा में गड़बड़ी की आशंका और मजबूत हुई। क्योंकि, दोबारा परीक्षा के परिणामों ने भी पहले परिणाम की संदिग्ध तस्वीर को और मजबूत किया।
2019 में विजिलेंस को जांच, जनवरी 2020 में एफआइआर
सरकार ने वर्ष 2019 में मामले की जांच सतर्कता अधिष्ठान को सौंप दी। विजिलेंस ने खुली जांच के बाद जनवरी 2020 में मुकदमा दर्ज किया। हालांकि, शुरुआती दौर में जांच बेहद धीमी रही और लंबे समय तक किसी आरोपी की गिरफ्तारी नहीं हुई। वर्ष 2022 में जब भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ी के अन्य मामले सामने आए तो पुराने वीपीडीओ प्रकरण की जांच भी दोबारा तेज हुई।
एसटीएफ के हाथ आई जांच तो खुला ओएमआर का खेल
अगस्त-सितंबर 2022 में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देश पर मामला विजिलेंस से एसटीएफ को सौंपा गया। एसटीएफ ने सबसे पहले परीक्षा की ओएमआर शीटों की फारेंसिक जांच कराई। चंडीगढ़ स्थित फॉरेंसिक लैब की रिपोर्ट में 54 ओएमआर शीटों में परीक्षा के बाद छेड़छाड़ कर दोबारा उत्तरों के गोले भरे जाने की पुष्टि हुई।
जांच में यह भी सामने आया कि ओएमआर की स्कैनिंग और अंतिम परिणाम तैयार करने का काम आयोग के तत्कालीन सचिव मनोहर सिंह कन्याल के घर पर हुआ था। एसटीएफ ने दो दर्जन से अधिक अभ्यर्थियों की पहचान कर उनके बयान दर्ज किए और कई महत्वपूर्ण गवाहों के बयान न्यायालय में भी दर्ज कराए। यहीं से मामला महज परीक्षा में अनियमितता से आगे बढ़कर ओएमआर शीट में सुनियोजित हेराफेरी और पैसे लेकर अभ्यर्थियों को लाभ पहुंचाने के आरोप तक पहुंचा।
पहले तीन गिरफ्तार, फिर आयोग के तीन बड़े अधिकारी जेल पहुंचे
एसटीएफ ने जांच के शुरुआती चरण में तीन आरोपितों को गिरफ्तार किया। इनमें आरएमएस टेक्नो साल्यूशंस से जुड़े राजेश पाल, पौड़ी में तैनात शिक्षक मुकेश कुमार शर्मा और काशीपुर निवासी मुकेश चौहान शामिल थे। जांच में आरोप लगा कि पैसे लेकर अभ्यर्थियों को लाभ पहुंचाने के लिए ओएमआर शीट में उत्तरों के गोले बदले गए।
इसके बाद 8 अक्टूबर 2022 को एसटीएफ ने चयन आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष डा आरबीएस रावत (रिटायर्ड पीसीसीएफ), तत्कालीन सचिव मनोहर सिंह कन्याल और तत्कालीन परीक्षा नियंत्रक राजेंद्र सिंह पोखरिया को गिरफ्तार कर लिया। यह इस मामले की सबसे बड़ी कार्रवाई थी।
इस तरह वीपीडीओ-2016 प्रकरण में शुरुआती तौर पर छह प्रमुख गिरफ्तारियां सामने आईं—राजेश पाल, मुकेश कुमार शर्मा, मुकेश चौहान, आरबीएस रावत, मनोहर सिंह कन्याल और राजेंद्र सिंह पोखरिया। बाद में एसटीएफ ने अन्य आरोपियों को भी मामले से जोड़ा और कुल आरोपियों की संख्या बढ़ती गई।
चार्जशीट में छह और नाम, 54 ओएमआर बनी अहम कड़ी
जनवरी 2023 में एसटीएफ ने आरबीएस रावत, मनोहर कन्याल, राजेंद्र पोखरिया तथा आरएमएस कंपनी से जुड़े राजेश चौहान, संजीव चौहान और विपिन बिहारी के खिलाफ करीब 4,500 पन्नों की चार्जशीट दाखिल की। इससे पहले तीन आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल हो चुकी थी।
एसटीएफ ने कुल 12 लोगों को आरोपी बनाए जाने की जानकारी दी थी। साथ ही आपराधिक साजिश और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराएं लगाई गईं। फॉरेंसिक रिपोर्ट में 54 ओएमआर शीटों से छेड़छाड़ को अहम साक्ष्य माना गया।
यहां से कहानी पहुंची ईडी तक
राज्य पुलिस की जांच से निकली यह कहानी बाद में धन के लेन-देन तक पहुंची। ईडी ने आयोग से जुड़ी विभिन्न एफआईआर के आधार पर पीएमएलए के तहत जांच शुरू की। ईडी की दिसंबर 2024 की आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक एजेंसी ने आयोग की विभिन्न परीक्षाओं से जुड़े पेपर लीक मामलों में जांच शुरू की थी। उस कार्रवाई में बैंक बैलेंस फ्रीज करने और नकदी जब्त करने की कार्रवाई भी हुई थी। यहीं से ईडी की जांच का फंदा पूर्व ओएसडी चंदन सिंह जीना तक भी पहुंचा।