
आईआईटी रुड़की के नए शोध से पता चला है कि पश्चिमी विक्षोभों का व्यवहार बदल रहा है। ये अब प्री-मानसून महीनों में भी सक्रिय होकर हिमालयी क्षेत्रों में वर्षा बढ़ा रहे हैं। इससे उत्तरी भारत में जलवायु सहनशीलता,
आपदा तैयारी और जल सुरक्षा पर नई चिंताएं पैदा हो गई हैं। अध्ययन में लंबी यात्रा दूरी और अधिक नमी अवशोषण जैसे बदलाव देखे गए, जो चरम मौसमी घटनाओं को तीव्र कर रहे हैं।
रुड़की। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) के नए शोध अध्ययन ने पश्चिम विक्षोभों के व्यवहार में मौलिक परिवर्तन की बात सामने लाई है। इस अध्ययन ने उत्तरी भारत में जलवायु सहनशीलता,
आपदा तैयारी और जल सुरक्षा को लेकर नई चिंताएं उत्पन्न की हैं। पश्चिमी विक्षोभ हिमालयी क्षेत्र में वर्षा और हिमपात को नियंत्रित करने वाली एक महत्वपूर्ण मौसम प्रणाली है।
शोध में यह बात सामने आई कि परंपरागत रूप से शीतकालीन हिमपात से जुड़े पश्चिमी विक्षोभ अब प्री-मानसून महीनों में भी बढ़ता प्रभाव दिखा रहे हैं। इससे हिमालय और आसपास के क्षेत्रों में वर्षा के मौसमी संतुलन में बदलाव आ रहा है।
इंटरनेशनल जर्नल आफ क्लाइमेटोलाजी में प्रकाशित इस अध्ययन के निष्कर्ष संकेत देते हैं कि जलवायु ऊष्मायन न केवल चरम मौसम घटनाओं को तीव्र बना रहा है, बल्कि बड़े पैमाने की वायुमंडलीय प्रणालियों के समय, संरचना और प्रभाव को भी पुनःपरिभाषित कर रहा है।
अध्ययन से पता चला कि पश्चिमी विक्षोभ शीत ऋतु से परे भी अधिक सक्रिय हो रहे हैं। लंबी दूरी तय कर रहे हैं और भारतीय उपमहाद्वीप तक पहुंचने से पहले अधिक नमी एकत्रित कर सकते हैं। इसके परिणामस्वरूप विशेष रूप से मार्च से मई के दौरान इन प्रणालियों से जुड़ी वर्षा में वृद्धि देखी जा रही है।
सात दशक से अधिक के वायुमंडलीय और वर्षा संबंधी आंकड़ों के विश्लेषण से शोधकर्ताओं ने पश्चिमी विक्षोभों के मार्गों में स्पष्ट व्यावहारिक और संरचनात्मक परिवर्तन पहचाने, जिनमें लंबी यात्रा दूरी, अधिक नमी अवशोषण और ऊपरी स्तर की तेज हवाएं शामिल हैं।
ये सभी कारक पारंपरिक शीतकालीन अवधि से बाहर वर्षा की तीव्रता को बढ़ाते हैं। जल विज्ञान विभाग की पीएचडी शोधार्थी स्पंदिता मित्रा ने बताया कि दीर्घकालिक जलवायु आंकड़ों के साथ निकटता से कार्य करते हुए यह देखना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि पश्चिमी विक्षोभ अपनी मौसमी भूमिका को किस प्रकार निरंतर बदल रहे हैं।
आज हम जमीन पर जो अनियमित वर्षा और अचानक चरम घटनाएं देख रहे हैं, वे इन व्यापक वायुमंडलीय परिवर्तनों को स्पष्ट रूप से प्रतिबिंबित करती हैं। 2023 की हिमाचल बाढ़ और 2025 उत्तराखंड बाढ़ जैसी चरम घटनाएं भी मानसून काल के दौरान इन विक्षोभों के बढ़ते प्रभाव को दर्शाती हैं।
जल विज्ञान विभाग के प्रधान अन्वेषक प्रो. अंकित अग्रवाल ने बताया कि पश्चिमी विक्षोभ विशेष रूप से प्री-मानसून अवधि में महत्वपूर्ण मौसमी और संरचनात्मक परिवर्तन से गुजर रहे हैं। इस परिवर्तन के हिमालय और आसपास के क्षेत्रों में जल संसाधनों, चरम मौसम घटनाओं और आपदा संवेदनशीलता पर दूरगामी प्रभाव हैं।
आईआईटीके निदेशक प्रो. केके पंत ने कहा कि ऐसे वैज्ञानिक प्रमाण पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों जैसे हिमालय में जलवायु सहनशीलता की योजना को पुनर्विचार करने के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। यह अध्ययन जलवायु विज्ञान को आगे बढ़ाने के प्रतिआईआईटीरुड़की की प्रतिबद्धता को सुदृढ़ करता है, जो सीधे नीति और तैयारी को सूचित करता है।









