उत्तराखण्ड

Big Breaking:-उत्तराखंड में नहरों के पानी की चोरी पर लगेगा जुर्माना, सिंचाई ढांचे को नुकसान पहुंचाने पर होगी जेल

उत्तराखंड में नहरों और गूलों के पानी की चोरी रोकने और सिंचाई ढांचे को नुकसान पहुंचाने पर अब सख्त कार्रवाई होगी। अनधिकृत उपयोग पर जुर्माना और क्षति पहुंचाने पर छह माह तक की जेल का प्रावधान किया गया है।

चंपावत। प्रदेश में नहरों और गूलों के पानी के अनधिकृत उपयोग पर अब शिकंजा कसने की तैयारी है। सिंचाई नहर के पानी का बिना अनुमति उपयोग करने पर जुर्माना लगाया जाएगा।

वहीं नहर, गूल अथवा सिंचाई से जुड़ी संरचना को क्षति पहुंचाने पर छह माह तक कारावास का प्रावधान होगा। नहरों की सुरक्षा और जल प्रबंधन को लेकर प्रस्तावित व्यवस्था में नहर व अन्य सिंचाई संरचनाओं के 200 मीटर की परिधि में प्लास्टिक और खनन पूरी तरह प्रतिबंधित किया जाएगा।

उत्तराखंड में सिंचाई व्यवस्था का व्यापक नेटवर्क है। सिंचाई विभाग के अधीन करीब 6600 किलोमीटर लंबी नहरें हैं, जिनसे करीब 2.27 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई होती है। वहीं पर्वतीय क्षेत्रों में खेतों तक पानी पहुंचाने में गूलों की अहम भूमिका है।

उपलब्ध राज्य स्तरीय आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में गूलों का नेटवर्क 30,217.46 किलोमीटर लंबा है। चंपावत जिले में ही करीब 1178.51 किलोमीटर गूल नेटवर्क दर्ज है। नई व्यवस्था में नहर के पानी के उपयोग को नियंत्रित किया जाएगा।

बिना अनुमति या निर्धारित व्यवस्था के विपरीत पानी लेने पर संबंधित व्यक्ति के खिलाफ जुर्माने का प्रावधान होगा। इसका उद्देश्य नहरों से पानी की चोरी और मनमाने तरीके से पानी लेने पर रोक लगाना है।

जल उपलब्धता के अनुसार किसानों को सिंचाई के लिए पानी का व्यवस्थित वितरण सुनिश्चित करने पर भी जोर रहेगा। कैविनेट बैठक में नहर, गूल या सिंचाई व्यवस्था से जुड़ी संरचना को क्षति पहुंचाना भी दंडनीय होगा।

ऐसी संरचना को नुकसान पहुंचाने पर छह माह तक कारावास का प्रावधान किया गया है। इससे नहर की पटरी काटने, पानी का रास्ता बदलने और सिंचाई ढांचे को नुकसान पहुंचाने जैसी गतिविधियों पर अंकुश लगाने की कोशिश होगी।

200 मीटर की परिधि में खनन और प्लास्टिक पर रोक

सिंचाई नहरों और संबंधित संरचनाओं की सुरक्षा के लिए इनके आसपास 200 मीटर के दायरे में खनन और प्लास्टिक पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा। खनन से नहरों के किनारों और संरचना को नुकसान पहुंचने की आशंका रहती है, जबकि प्लास्टिक कचरे से जल प्रवाह प्रभावित हो सकता है। प्रतिबंधित क्षेत्र में गतिविधियों पर निगरानी और कार्रवाई की व्यवस्था भी नियमों में शामिल होगी।

चंपावत में 1178 किमी से अधिक गूल नेटवर्क

पर्वतीय क्षेत्रों में पारंपरिक गूल सिंचाई व्यवस्था आज भी खेतों तक पानी पहुंचाने का प्रमुख माध्यम है। राज्य में 30,217.46 किलोमीटर गूल नेटवर्क में चंपावत की हिस्सेदारी करीब 1178.51 किलोमीटर है।

ऐसे में जिले के ग्रामीण और पर्वतीय क्षेत्रों में गूलों की मरम्मत, रखरखाव और जल प्रबंधन का सीधा असर कृषि पर पड़ेगा। नई व्यवस्था से नहर और गूलों के पानी के उपयोग के साथ-साथ इनके ढांचे की सुरक्षा को भी कानूनी संरक्षण मिलेगा।

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