Big Breaking:-देहरादून के वैज्ञानिकों का अहम शोध, प्राचीन सूक्ष्मजीवों के डीएनए से जलवायु और जीवन विकास के नए संकेत मिले

वैज्ञानिकों ने मेटजीनोमिक्स जैसी आधुनिक तकनीकों से प्राचीन सूक्ष्मजीवियों के डीएनए का अध्ययन कर पृथ्वी के अतीत, जलवायु परिवर्तन और जीवन के विकास की नई दिशा बताई है।

देहरादून। देश के विज्ञानियों ने एक अहम शोध के माध्यम से यह पुष्ट किया है कि पृथ्वी के अतीत, जलवायु परिवर्तन, जीवन के विकास और भविष्य की दिशा पता करने के लिए अब पारंपरिक भूविज्ञान (जियोसाइंस) पर्याप्त नहीं है।

इस बात को सिद्ध करने के लिए वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के पूर्व विज्ञानी (वर्तमान में आइआइटी रुड़की में तैनात) डा. प्रदीप श्रीवास्तव ने मेटजीनोमिक्स और मेटाबोलोमिक्स जैसी आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी से प्राचीन सूक्ष्मजीवियों के डीएनए की जांच की।

ताकि हजारों साल पहले सूक्ष्मजीवियों की मौजूदगी और पर्यावरणीय परिस्थितियों के बारे में पता लगाया जा सके। इस शोध को प्रसिद्ध करंट साइंस जर्नल में प्रकाशित किया गया है।

वरिष्ठ विज्ञानी डा. प्रदीप श्रीवास्तव के शोध के अनुसार पारंपरिक जलवायु तकनीकें करीब 40 प्रतिशत जैविक जानकारी को खो देती हैं। वहीं, नई तकनीक इन्हें पकड़ लेती हैं।

इस शोध में यह अहम जानकारी मिली है कि सूक्ष्मजीवी जलवायु बदलाव पर सबसे पहले प्रतिक्रिया देते हैं। जिससे भविष्य में जलवायु माडल को अधिक सटीक बनाया जा सकता है।

साथ ही 3.76 अरब साल पुरानी चट्टानों में भी जैविक संकेत मिले हैं। करोड़ों साल पुराने सूक्ष्मजीवियों के डीएनए और जैव संकेतकों से बेहद सटीक ढंग से यह पता चल सकता है कि जीवन कब और कैसे विकसित हुआ व कौन से जीव किस क्रम में मौजूद रहे।

एंटीबायोटिक प्रतिरोधकता नई नहीं

शोध में पाया गया है कि 30 हजार साल पुराने नमूनों में भी एंटीबायोटिक प्रतिरोधी बैक्टीरिया थे। मतलब यह कि यह समस्या प्राकृतिक भी हो सकती है। इसे सिर्फ आधुनिक नहीं माना जा सकता।

वहीं, नई जानकारी के तौर पर पता चला कि सूक्ष्मजीवी जलवायु के पहले संकेतक हैं। जलवायु बदलते हुए यह जीव भी बदल जाते हैं। इसलिए इनका प्रयोग अर्ली वार्निंग सिस्टम के रूप में किया जा सकता है।

दूसरी तरफ पृथ्वी की कई प्रक्रियाओं जैसे- चट्टानों का टूटना, आक्सीजन बनना और धातुओं के बनने को भी सूक्ष्मजीवी नियंत्रित करते हैं। लेकिन, ये जीव जीवाश्म (फासिल्स) में हैं दिखते। इसलिए इन्हें नजरअंदाज किया गया। अब मेटजीनोमिक्स से इनका पता लग पा रहा है।

डेटाबेस बनाकर भविष्य को दी जा सकती है नई दिशा

शोधपत्र में विज्ञानियों ने कहा कि भारत में जैव संकेतकों (बायोमार्कर) पर कुछ काम हुआ, मगर मेटजीईनोमिक्स अभी सीमित है।

इसे बढ़ावा देने के लिए प्राचीन डीएनए, बायोमार्कर, जलवायु डेटा, जैवविविधता का एक विशाल डेटाबेस बनाने की आवश्यकता है। जिससे भविष्य के जलवायु खतरों को समझा जा सकता है और आपदाओं की भविष्यवाणी को बेहतर बनाया जा सकता है।

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