उत्तराखंड चाय विकास बोर्ड ने घोड़ाखाल चाय बागान में चाय पत्ती के पकौड़े परोसना शुरू किया है, जिससे सैलानियों का अनुभव और बेहतर होगा।
देहरादून। जरा कल्पना कीजिए…। कौसानी की वादियों में सामने बर्फ से लकदक हिमालय हो, रिमझिम फुहारें गिर रही हों और हाथ में कड़क चाय की प्याली और प्लेट में ताजी चाय पत्तियों से बने स्वादिष्ट कुरकुरे पकौड़े हों तो सोने में सुहागा। यह नवोन्मेष देवभूमि आने वाले सैलानियों के सफर का आनंद दोगुना करने को तैयार है।
यानी, खूबसूरत चाय बागान आंखों को सुकून और जेहन को खुशबू ही नहीं देंगे, बल्कि स्वाद का मिजाज भी बदलने वाले हैं। टी-टूरिज्म को बढ़ावा देने के लिए उत्तराखंड चाय विकास बोर्ड ने असोम की तर्ज पर घोड़ाखाल चाय बागान के कैफे में चाय पत्ती के गरमा-गरम पकौड़े सैलानियों को परोसने की पहल की है। अब कौसानी और चंपावत के चाय बागानों में भी इसकी तैयारी है।
चाय पत्ती के गरमा-गरम पकौड़े
राज्य में फिलवक्त घोड़ाखाल, कौसानी व चंपावत के चाय बागानों में टी-टूरिज्म पर ध्यान केंद्रित किया गया है। तीनों बागानों में पर्यटन से सालाना लगभग चार करोड़ की आमदनी भी होती है।
वहां लोग चाय बागानों की सैर करने के साथ ही चाय की पत्तियों के तुड़ान से लेकर इसके प्रसंस्कृत होने की प्रक्रिया को करीब से देखते हैं। साथ ही चाय की चुस्कियां भी लेते हैं। बागानों में सैलानियों के लिए कैफे समेत अन्य सुविधाएं भी विकसित की गई हैं। अब इसमें चाय की ताजा हरी पत्तियों के पकौड़े भी शामिल हो गए हैं।
असोम से मिली प्रेरणा
उद्यान मंत्री गणेश जोशी की अगुआई में कुछ समय पहले चाय विकास बोर्ड का दल असोम के दौरे पर गया था। दल में शामिल रहे चाय विकास बोर्ड के निदेशक महेंद्र पाल के अनुसार असोम के चाय बागानों के भ्रमण के दौरान देखा गया कि वहां चाय की हरी पत्तियों से बने पकौड़े सैलानियों को परोसे जा रहे हैं। इसी से प्रेरित होकर उत्तराखंड में भी यह पहल की गई है।
लजीज स्वाद का अहसास
बोर्ड के निदेशक पाल बताते हैं कि चाय के पौधे के ऊपर की ढाई पत्तियों को चाय के लिए तोड़ा जाता है। शेष नीचे की हरी पत्तियों का उपयोग पकौड़े बनाने में किया जाता है। पकौड़े में चाय की ताजी पत्तियों का हल्का कसैलापन और कड़कपन जब पुदीने की चटनी के साथ जुबां में घुलता है तो यह लजीज स्वाद का अहसास कराता है।