Big Breaking:-दून की सड़कों पर ‘बेलगाम’ पब्लिक ट्रांसपोर्ट, मनमानी और जाम से लोग परेशान

दून शहर में सिटी बस से ई-रिक्शा तक सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था अव्यवस्था का कारण बन रही है, जिससे सड़कों पर जाम और अराजकता बढ़ रही है।

देहरादून। स्मार्ट सिटी की तरह चमकने की राह तलाश रहे दून शहर में सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था सबसे बड़ी चुनौती बनती जा रही है।

राजधानी की सड़कों पर सिटी बस, विक्रम, आटो, ई-रिक्शा और ई-आटो की बढ़ती संख्या अब सुविधा से ज्यादा अव्यवस्था का कारण बन रही है। हालत यह है कि ट्रैफिक नियम कागजों तक सीमित दिखाई देते हैं और सड़क पर मनमाना संचालन हावी नजर आता है।

बिना तय रूट के दौड़ रहे ई-रिक्शा

राजपुर रोड, घंटाघर, आइएसबीटी, दर्शनलाल चौक, सहारनपुर रोड, बल्लूपुर, प्रेमनगर और रायपुर जैसे प्रमुख मार्गों पर हर दिन सार्वजनिक वाहनों की अव्यवस्थित आवाजाही से जाम की स्थिति बनी रहती है। कहीं सड़क के बीचोंबीच सवारी भरी जा रही है तो कहीं ई-रिक्शा बिना तय रूट के दौड़ते नजर आते हैं।

शहर की बदहाल सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था व बढ़ते दबाव को देखते हुए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने पिछले बुधवार को हुई कैबिनेट बैठक में परिवहन विभाग को सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था सुधारने व शहर में बसों की संख्या बढ़ाने के निर्देश दिए। हालांकि, मौजूदा हालात बताते हैं कि जमीन पर अभी लंबा काम बाकी है।

संगठित बस सेवा नहीं, छोटे वाहनों का कब्जा

देहरादून में वर्षों से आधुनिक और व्यवस्थित सिटी बस नेटवर्क की चर्चा होती रही, लेकिन आज भी अधिकांश क्षेत्रों में लोग विक्रम, आटो और ई-रिक्शा पर निर्भर हैं।

यही कारण है कि छोटे सार्वजनिक वाहनों का दबाव लगातार बढ़ता गया। यातायात विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि शहर में पर्याप्त, समयबद्ध और रूट आधारित बस सेवा विकसित होती तो ट्रैफिक का बड़ा दबाव कम हो सकता था। फिलहाल सार्वजनिक परिवहन ‘सिस्टम’ कम और ‘जुगाड़ माडल’ ज्यादा नजर आता है।

ई-रिक्शा बने नई ट्रैफिक चुनौती

पर्यावरण के लिहाज से बेहतर माने जाने वाले ई-रिक्शा और ई-आटो अब शहर की ट्रैफिक व्यवस्था के लिए नई चुनौती बन चुके हैं। पिछले कुछ वर्षों में इनकी संख्या तेजी से बढ़ी, लेकिन इनके संचालन के लिए न तो स्पष्ट जोन तय हो पाए और न ही प्रभावी मानिटरिंग व्यवस्था बन सकी। स्थिति यह है कि कई ई-रिक्शा बिना परमिट रूट, बिना स्टैंड और बिना समय नियंत्रण के मुख्य बाजारों व संकरी सड़कों पर संचालित हो रहे हैं। इससे जाम की स्थिति और गंभीर हो रही है।

ओवरलोडिंग से बढ़ रहा हादसों का खतरा

विक्रम और आटो में क्षमता से अधिक सवारियां बैठाना अब आम दृश्य बन चुका है। स्कूल और दफ्तर के समय हालात और बिगड़ जाते हैं। कई चालक सड़क के बीच वाहन रोककर सवारी भरते हैं, जिससे पीछे लंबा जाम लग जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि शहर में सार्वजनिक परिवहन सेवा के नाम पर अनौपचारिक व्यवस्था विकसित हो चुकी है, जहां नियमों से ज्यादा सड़क पर संख्या का दबदबा दिखाई देता है।

योजनाएं खूब बनीं, असर कम दिखा

दून में इलेक्ट्रिक बस, स्मार्ट बस स्टाप, इंटीग्रेटेड ट्रांसपोर्ट सिस्टम और रूट रेशनलाइजेशन जैसी योजनाएं वर्षों से चर्चा में हैं। ई-रिक्शा संचालन के लिए जोन तय करने व सार्वजनिक वाहनों की डिजिटल मानिटरिंग की बातें भी कई बार उठीं, लेकिन जमीनी स्तर पर बदलाव सीमित ही नजर आया। अब मुख्यमंत्री धामी के निर्देशों के बाद परिवहन विभाग पर व्यवस्था सुधारने का दबाव बढ़ गया है। माना जा रहा है कि आने वाले समय में सिटी बस सेवा विस्तार, रूट आधारित संचालन और सख्त प्रवर्तन पर फोकस बढ़ सकता है।

शहर में 35 हजार से ज्यादा सार्वजनिक वाहन

आरटीओ आंकड़ों के अनुसार दून शहर में इस समय 35,339 सार्वजनिक परिवहन वाहन संचालित हो रहे हैं। इनमें 14,614 टैक्सी-कैब, 5,343 मैक्सी-कैब, 4,395 ई-रिक्शा, 4,202 डीजल बस, 3,764 ई-आटो और 2,337 आटो शामिल हैं। इसके अलावा 394 विक्रम, 248 ई-कार्ट और 39 इलेक्ट्रिक बसें भी शहर में संचालित हो रही हैं। वहीं 15,517 बड़े और छोटे भार वाहन भी सड़कों पर दबाव बढ़ा रहे हैं।

विशेषज्ञ बोले, बिना समन्वित नीति नहीं सुधरेंगे हालात

एसडीसी फाउंडेशन के संस्थापक अनूप नौटियाल का कहना है कि समस्या केवल वाहनों की संख्या नहीं, बल्कि समन्वित नीति की कमी है। जब तक दून में रूट आधारित, समयबद्ध, तकनीक आधारित सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था विकसित नहीं होगी, तब तक अव्यवस्था कम होना मुश्किल है। उन्होंने कहा कि दून तेजी से फैलता शहर है, लेकिन उसकी सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था अब भी पुराने ढांचे में फंसी हुई है। यदि समय रहते सुधार नहीं किए गए तो आने वाले वर्षों में स्थिति और गंभीर हो सकती है।

शहर में प्रमुख समस्याएं

  • बिना तय रूट सार्वजनिक वाहनों का संचालन
  • सड़क पर सवारी भरने से जाम
  • ई-रिक्शा और आटो की अनियंत्रित संख्या
  • ओवरलोडिंग और सुरक्षा नियमों की अनदेखी
  • पर्याप्त सिटी बस सेवा का अभाव
  • ट्रैफिक पुलिस और परिवहन विभाग में समन्वय की कमी

संभावित समाधान

  • सिटी बस नेटवर्क का विस्तार
  • ई-रिक्शा और आटो के लिए तय जोन
  • डिजिटल ट्रैकिंग और रूट मानिटरिंग
  • सार्वजनिक वाहनों के लिए निर्धारित स्टाप
  • नियमित प्रवर्तन अभियान
  • एकीकृत सार्वजनिक परिवहन नीति लागू करना
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