Big Breaking:-देहरादून रेलवे स्टेशन पर 126 साल बाद भी नहीं मिटे गुलामी के निशान, आज भी कायम है ब्रिटिश राज की छाप

रेलवे बोर्ड के निर्देशों के बावजूद, देहरादून रेलवे स्टेशन पर आज भी ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के कई निशान मौजूद हैं।

देहरादून। देशभर के रेलवे स्टेशनों से ब्रिटिश हुकूमत के प्रतीकों और परंपराओं को हटाने की कवायद तेज हो गई है। रेलवे बोर्ड ने सभी जोन को गुरुवार 14 मई तक औपनिवेशिक अवशेष चिह्नित कर हटाने के निर्देश दिए हैं। …लेकिन देहरादून रेलवे स्टेशन की पड़ताल में सामने आया कि यहां आज भी अंग्रेजों के दौर की निशानियां और कार्यसंस्कृति जिंदा हैं।

126 साल पुराने स्टेशन का ढांचा, रेलवे कालोनी, पुराने शेड, मेहराबदार भवन और कई प्रशासनिक परंपराएं अब भी ‘ब्रिटिश रेल राज’ की कहानी कह रही हैं। यहां प्लेटफार्म पर अब भी हिंदी व अंग्रेजी के साथ उर्दू में रेलवे स्टेशन लिखा हुआ है।

दून था पहाड़ों के प्रवेश द्वार

देहरादून रेलवे स्टेशन का निर्माण वर्ष 1899 में ब्रिटिश शासनकाल में हुआ था व एक मार्च 1900 को यहां पहली ट्रेन पहुंची थी। उस समय अंग्रेजों ने दून को पहाड़ों के प्रवेश द्वार और मसूरी तक पहुंचने के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित किया था।

रेलवे लाइन बनने के बाद दून में यूरोपीय बस्तियों, व्यापार और अंग्रेज अधिकारियों की आवाजाही तेजी से बढ़ी। स्टेशन परिसर के पिछले हिस्से व रेलवे कालोनी क्षेत्र में आज भी कई ब्रिटिशकालीन भवन मौजूद हैं।

लाल ईंटों से बने पुराने शेड, मेहराबदार गेट और मोटी दीवारों वाले भवन अंग्रेजी इंजीनियरिंग की छाप दिखाते हैं। रेलवे के पुराने ‘कोचिंग शेड’ अब भी स्टेशन के पीछे दिखाई देते हैं, जिन्हें करीब 1899 में बनाया गया था।

स्थानीय इतिहासकारों व पुराने रिकार्ड में इन भवनों का उल्लेख भी है। इन भवनों की बनावट आज की आधुनिक रेलवे इमारतों से पूरी तरह अलग है। बड़े मेहराब, ऊंची छतें और भारी लोहे के ढांचे सीधे ब्रिटिशकालीन रेलवे वास्तुकला की याद दिलाते हैं।

साहब संस्कृति’ खत्म नहीं, सिर्फ चेहरे बदले

रेलवे बोर्ड अब ‘गार्ड’ जैसे पदनाम बदलकर ‘ट्रेन मैनेजर’ कर रहा है और अंग्रेजी दौर की कई परंपराएं खत्म करने की तैयारी में है। लेकिन देहरादून स्टेशन पर आज भी रेलवे की कार्यशैली में ‘साहब संस्कृति’ की झलक दिखाई देती है।

पुराने निरीक्षण कक्ष, विश्राम गृह और अधिकारियों के उपयोग में आने वाला भारी लकड़ी का फर्नीचर अब भी उसी औपनिवेशिक सोच की याद दिलाता है, जिसमें अफसर और कर्मचारी के बीच स्पष्ट दूरी रखी जाती थी। रेलवे कालोनी के कुछ हिस्सों में अब भी पुराने ब्रिटिशकालीन क्वार्टर मौजूद हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, कई भवन दशकों पुराने हैं और उनकी संरचना में अंग्रेजी दौर की डिजाइन साफ दिखाई देती है।

मसूरी तक ट्रेन ले जाने का सपना भी यहीं से जुड़ा

कम लोगों को पता है कि अंग्रेजों ने देहरादून से मसूरी तक ट्रेन और ट्राम चलाने की भी योजना बनाई थी। 1921 में मसूरी इलेक्ट्रिक ट्रामवे कंपनी बनाई गई और योजना थी कि ट्राम लाइन रेलवे स्टेशन से शुरू होकर राजपुर रोड होते हुए मसूरी पहुंचे। इसके लिए दिलाराम बाजार व परेड ग्राउंड के पास स्टेशन भी बनाए गए थे, लेकिन सुरंग धंसने और आर्थिक गड़बड़ियों के बाद योजना ठंडे बस्ते में चली गई। आज भी शहर में कुछ पुराने ढांचों को उस अधूरी परियोजना से जोड़कर देखा जाता है।

स्टेशन माडर्न हुआ, लेकिन नहीं बदला इतिहास

वर्ष 2019-20 में स्टेशन का बड़े स्तर पर पुनर्विकास हुआ। नए प्लेटफार्म, एस्केलेटर, डिजिटल सिस्टम और आधुनिक सुविधाएं जोड़ी गईं, लेकिन स्टेशन का मूल ऐतिहासिक चरित्र पूरी तरह नहीं बदला।

रेलवे स्टेशन आज भी औपनिवेशिक और आधुनिक भारत के मिश्रण जैसा दिखाई देता है। रेलवे बोर्ड अब जिन प्रतीकों को हटाने की तैयारी में है, उनमें ब्रिटिश मोनोग्राम, पुराने औपनिवेशिक बैज, भारी विक्टोरियन फर्नीचर, अंग्रेजी दौर की शब्दावली, पीतल की घंटियां और साहिबी ड्रेस कोड शामिल हैं।

बड़ा सवाल

  • क्या देहरादून रेलवे स्टेशन से भी पूरी तरह मिट पाएंगे ‘ब्रिटिश रेल राज’ के निशान?
  • क्या केवल भवनों और प्रतीकों पर कार्रवाई होगी या रेलवे की कार्यसंस्कृति भी बदलेगी?
  • क्या रेलवे अपने इतिहास को सहेजते हुए औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर निकल पाएगा?
Ad Ad

सम्बंधित खबरें