
उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) भुवन चंद्र खंडूड़ी को उनके सशक्त लोकायुक्त विधेयक के लिए लंबे समय तक याद किया जाएगा।
देहरादून । उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मेजर जनरल, (सेवानिवृत्त) भुवन चंद्र खंडूड़ी को उत्तराखंड की राजनीति में एक सख्त, अनुशासित और ईमानदार नेता के रूप में लंबे समय तक याद किया जाएगा।
उनके निधन से आमजन से लेकर पूर्व सैनिक उनके परिवार गमगीन हैं। खंडूड़ी मुख्यमंत्री के रूप में उनके दो कार्यकाल सुशासन, भ्रष्टाचार के खिलाफ स्पष्ट रुख और प्रशासनिक दृढ़ता के लिए विशेष रूप से चर्चित रहे।
साहसिक और दुर्लभ कदम
खंडूड़ी के दूसरे कार्यकाल की सबसे बड़ी पहचान 1 नवंबर 2011 को पारित उत्तराखंड लोकायुक्त विधेयक रहा। यह कानून उस समय देश के सबसे सशक्त और व्यापक लोकायुक्त कानूनों में गिना गया। इसमें मुख्यमंत्री,
मंत्रिपरिषद और विधायकों को भी जांच के दायरे में लाने का प्रविधान था, जो भारतीय राजनीति में एक साहसिक और दुर्लभ कदम माना गया। इस विधेयक ने राज्य को पारदर्शिता और जवाबदेही के मामले में राष्ट्रीय स्तर पर अलग पहचान दिलाई।
यह विधेयक सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हज़ारे के नेतृत्व में चले भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और जन लोकपाल की मांगों से प्रेरित था। उत्तराखंड इस तरह उन शुरुआती राज्यों में शामिल हुआ, जिसने जन लोकपाल की प्रमुख विशेषताओं को अपने कानून में समाहित किया। हालांकि, इतने सशक्त कानून के बावजूद इसके प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। लोकायुक्त की नियुक्ति और संस्थागत मजबूती जैसे मुद्दे आज भी बहस का विषय बने हुए हैं।
इसके बावजूद, खंडूड़ी के इस कदम को उनकी राजनीतिक इच्छाशक्ति और ईमानदार छवि के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। सेना की पृष्ठभूमि से राजनीति में आए खंडूड़ी ने प्रशासन में अनुशासन और नियम-आधारित कार्यशैली को प्राथमिकता दी। उनके कार्यकाल में सड़कों और आधारभूत ढांचे के विकास पर भी विशेष ध्यान दिया गया। वे ऐसे नेता माने गए, जिन्होंने राजनीतिक लाभ-हानि से ऊपर उठकर निर्णय लेने की कोशिश की।
ईमानदार छवि से बनी पहचान
दिवगंत जननेता खंडूड़ी की छवि नो-नानसेंस नेता की रही। भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी सख्ती और प्रशासनिक अनुशासन ने उन्हें जनता और सरकारी तंत्र में अलग पहचान दिलाई। वे नियमों के पालन में किसी प्रकार की ढील के पक्षधर नहीं थे। यही कारण रहा कि कई बार उनके फैसले राजनीतिक रूप से कठिन साबित हुए, लेकिन उनकी विश्वसनीयता बनी रही। उनकी कार्यशैली ने शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करने का संदेश दिया।
उतार-चढ़ाव भरा रहा राजनीतिक सफर
मेजर जनरल के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद खंडूड़ी ने सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया और भारतीय जनता पार्टी से जुड़े। वे 2007 में पहली बार उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने और बाद में 2011 में दोबारा इस पद पर आसीन हुए। राष्ट्रीय राजनीति में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं। हालांकि उनका राजनीतिक सफर उतार-चढ़ाव से भरा रहा, लेकिन उनकी साफ-सुथरी छवि और सख्त प्रशासनिक शैली ने उन्हें विशिष्ट पहचान दिलाई।









