
लैंसडौन का नाम बदलने की कवायद से पर्यटन नगरी की पहचान पर संकट गहरा गया है। स्थानीय लोग नाम बदलने के बजाय सुविधाओं के विस्तार की मांग कर रहे हैं।
लैंसडौन । पर्यटन नगरी लैंसडौन का नाम पर्यटन के क्षेत्र में राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय पटल पर भी विख्यात है। मौजूदा परिप्रेक्ष्य में पर्यटन इस क्षेत्र की न सिर्फ रीढ़ बन चुका है। बल्कि, सरकार को करोड़ों रुपये का राजस्व भी प्रतिवर्ष मिल रहा है।
नगर में बढ़ते पर्यटन व्यवसाय के बीच ब्रिटिश कानून कैंट एक्ट के चलते पर्यटकों के लिए बुनियादी सुविधाओं का विस्तार तो नहीं हो पाया है। अलबत्ता, नाम बदलने की कवायद से नगर की पहचान पर संकट जरूर खड़ा हो गया है।
कई शहरों के नाम बदलने की कवायद
दरअसल, ब्रिटिश शासन के दौरान मुगलों व अंग्रेजों के नाम पर रखे गए कई शहरों के नाम बदलने की कवायद की सूची में लैंसडौन शहर का नाम शामिल किया गया। बकायदा इसके लिए क्षेत्रीय जनता से सार्वजनिक नोटिस जारी कर सुझाव व आपत्तियां भी मांग ली गई हैं।
लैंसडौन का नाम बदलने को लेकर फिर से सवाल दौड़ने लगे हैं कि जिस लैंसडौन नगर से राज्य गठन के बाद एक दर्जन से अधिक सरकारी कार्यालयों को शिफ्ट कर दिया गया है, क्या नाम बदलने से इस नगर का पुराना वैभव लौट पाएगा।
रोजगार व स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं के अभाव में लैंसडौन नगर पलायन का दंश झेल रहा है। क्षेत्रीय जनता आज भी लैंसडौन का नाम बदलने के बजाए नगर में बुनियादी सुविधाओं के विस्तार के पक्ष में खड़ी है।
बता दें कि पर्यटन नगरी पूर्ण रूप से कैंट शासित है। यही कारण है कि नगर में विकास का पहिया चलने से पहले ही जाम पड़ा है। आर्थिक तंगी से जूझ रहे कैंट बोर्ड की कमर बजट कटौती के चलते पूरी तरह टूट चुकी है।
विभाग में तैनात नियमित कर्मचारियों समेत संविदा कर्मचारियों को वेतन के लाले पड़े है, वहीं विकास योजनाएं फाइलों में ही दम तोड़ रही है। गत एक दशक के भीतर नगर में मूलभूत सुविधाओं के अभाव के चलते पलायन की समस्या पर्यटन नगरी की बड़ी समस्याओं में शुमार हो गई है।
पूर्व में भी हो चुके नाम बदलने के प्रयास
लैंसडौन नगर का नाम बदलने के प्रयास पूर्व में भी हो चुके हैं। इससे पूर्व लैंसडौन का नाम बदलकर इसका पौराणिक नाम कालौडांडा करने की मांग ने भी जोर पकड़ा। इसे लेकर राज्य से लेकर केंद्र सरकार तक प्रस्ताव भेजे गए।
जबकि हाल ही में लाट सूबेदार बलभद्र सिंह नेगी के नाम पर भी लैंसडौन का नाम रखने की कवायद की गई। जबकि लैंसडौन नगर गढ़वाल राइफल्स का मुख्यालय होने के कारण सीडीएस जनरल स्व. विपिन रावत के नाम पर भी लैंसडौन का नाम रखने की चर्चाएं रही।
लैंसडौन का नाम इस क्षेत्र की जनता के रग-रग में रच-बस गया है। लैंसडौन के नाम से लैंसडौन के लोगों का भावनात्मक रिश्ता जुड़ा है। कई पीढ़ियों की पहचान नगर के नाम से जुड़ी है। लैंसडौन इस नगर का नाम ही नहीं, बल्कि अपने आप में हर व्यक्ति की जनभावना है। भविष्य में यदि लैंसडौन का नाम बदलने की कवायद फिर से शुरू हुई तो हम इसका विरोध करेंगे। – डा. एसपी नैथानी, वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता, लैंसडौन









